उनकी आँखों में गर्व चमक उठा।
“ताकि मैं आराम से जी सकूँ, अच्छा खा सकूँ, दुनिया की हर सुख-सुविधा का मज़ा ले सकूँ।”
मैं अनायास हँस पड़ा।
“सेठजी, पर आराम कहाँ है?
नींद आपकी दवाइयों में कैद है, स्वाद आपकी थाली से भाग गया है।
इतना धन होते हुए भी एक किसान की सूखी रोटी आपसे ज्यादा स्वादिष्ट है।”
सेठजी चुप हो गए।
उनकी आँखों में पहली बार भारीपन उतर आया।
उसी समय खिड़की से बाहर नज़र पड़ी।
हवेली के आँगन से दूर, एक किसान अपने छोटे-से घर के बरामदे में बैठा था।
उसके सामने मिट्टी की चूल्हे पर बनी मोटी-मोटी रोटियाँ और प्याज़ पड़ी थी।
बच्चे हँसी-खुशी के साथ बैठकर खाना खा रहे थे।
थाली में घी या मिठाई नहीं थी, पर हर कौर में सुकून और संतोष छलक रहा था।
मैंने धीमे स्वर में कहा—
“सेठजी, सुख का स्वाद अमीरी की थाली में नहीं, मन की शांति में है।
धन से हम मकान खरीद सकते हैं, पर घर नहीं।
खाना खरीद सकते हैं, पर भूख नहीं।
दवा खरीद सकते हैं, पर नींद नहीं।”
अब सेठजी के चेहरे पर गहरी चुप्पी छा गई थी।
उनकी आँखें उस किसान और उसके परिवार की हँसी पर टिक गईं।
पहली बार शायद उन्होंने अपने भीतर एक खालीपन महसूस किया।
मेरी थाली में साधारण दाल-रोटी थी, पर हर निवाला रस से भरा हुआ था।
उनकी थाली में ढेरों व्यंजन थे, लेकिन स्वाद गायब था।