गाँव में सेठ जगन्नाथ जमींदार का बड़ा रुतबा था।
सारा इलाका उन्हें सलाम करता, उनकी हवेली पूरे गाँव में किसी राजमहल से कम न थी।
गाँव में सेठ जगन्नाथ जमींदार का बड़ा रुतबा था।
सारा इलाका उन्हें सलाम करता, उनकी हवेली पूरे गाँव में किसी राजमहल से कम न थी।
गाँव में सेठ जगन्नाथ जमींदार का बड़ा रुतबा था।
सारा इलाका उन्हें सलाम करता, उनकी हवेली पूरे गाँव में किसी राजमहल से कम न थी।
एक दिन अचानक उनका प्यादा मेरे घर आया और बोला,
“मास्टरजी, सेठजी ने आपको आज रात के भोज पर बुलाया है।”
मैं चौंक गया।
“अरे, ये तो कमाल है। मैं तो बस एक साधारण मास्टर, और बुलावा खुद सेठजी के घर से?”
मन में संकोच भी था और जिज्ञासा भी।
शाम ढलते ही मैं उनकी हवेली पहुँचा।
दरवाज़े पर खड़े चौकीदार ने सलाम ठोका।
अंदर कदम रखते ही लगा जैसे किसी महल में आ गए हों।
संगमरमर की फर्श, झूमरों की रोशनी, और इत्र की खुशबू से पूरा आँगन महक रहा था।
भोजन कक्ष में तो मानो स्वर्ग उतर आया हो।