समीक्षा रेज़िडेंसी” शहर की उन आधुनिक सोसायटियों में से थी जहाँ हर सुविधा मौजूद थी। गेट पर गार्ड, अंदर पार्क, बच्चों का खेलने का ज़ोन, जिम, और रोज़ शाम को पार्क में बैठकर गपशप करने वाली औरतें।
यहाँ रहने वाले ज़्यादातर लोग पढ़े-लिखे और पैसे वाले थे। पर पैसों और पढ़ाई के साथ-साथ एक और चीज़ यहाँ खूब थी
चुगली और दिखावा
हर शाम, पार्क की बेंच पर औरतों का छोटा-सा दरबार सजता। उनमें से सबसे मुखर थी जाहन्वी।
स्टाइलिश कपड़े, कटे-कलर्ड बाल, हाथों में हमेशा चमकदार नेलपॉलिश और मुँह से निकले ताने – यही उसकी पहचान थी।
उसकी सबसे करीबी दोस्त थी नमिता, जो थोड़ी समझदार ज़रूर थी पर जाहन्वी के आगे ज़्यादातर चुप रह जाती।
नया परिवार
दो महीने से ब्लॉक-सी का एक फ्लैट खाली पड़ा था। अब वहाँ नया परिवार आया था।
“अरे जाहन्वी, लगता है उस फ्लैट में कोई आ गया है। अच्छा है, रौनक बढ़ेगी,” नमिता ने एक दिन फोन पर कहा।
जाहन्वी ने नाक सिकोड़ते हुए जवाब दिया –
“हाँ, मैंने भी कल एक औरत को देखा था सब्ज़ी वाले के ठेले पर। पता है? देखने में बिल्कुल गंवार सी लग रही थी। न कपड़ों में स्टाइल, न चाल-ढाल में कोई क्लास। ऊपर से सब्ज़ी वाले से कितनी देर मोल-भाव करती रही। मालकिन थी या काम वाली, कुछ समझ ही नहीं आया।”
नमिता ने टोका –
“जाहन्वी, बिना जाने किसी के बारे में ऐसे मत बोला कर। हो सकता है बहुत अच्छी निकले।”
पर जाहन्वी हँस दी –
“अच्छी? अरे नमिता, ऐसे लोग ज़िंदगी में कुछ बन ही नहीं सकते। मालूम नहीं कहाँ से आ धमके हैं यहाँ।”