सुबह के पाँच बजे ही वंदना की आँखें खुल जाती थीं। अलार्म की ज़रूरत उसे नहीं थी, आदत ही ऐसी बन चुकी थी। दिन की शुरुआत झाड़ू-पोंछा, बर्तन और नाश्ते की तैयारी से होती। बच्चे स्कूल जाते, सास-ससुर के लिए पूजा और चाय बनती, पति के कपड़े और ऑफिस का टिफिन पैक होता। इस भागदौड़ में उसका अपना अस्तित्व कहीं खो जाता था। कई बार वो अपने लिए चाय रखती, मगर जब तक उसे उठाती, वह ठंडी हो चुकी होती।
उस रोज़ भी यही हुआ। उसने चाय रखी, फिर बच्चों के टिफिन में उलझ गई। तभी दरवाज़े पर पड़ोस की सखी माया आ गई।
“अरे वंदना! अब तक चाय नहीं पी?”
वंदना मुस्कुरा दी, “कहाँ यार, वक्त ही नहीं मिलता। चलो, चावल के सेव बनाए थे, तुम्हें खिलाती हूँ। तुम्हारे साथ ही मैं भी खा लूँगी।”
माया हँस दी, “ठीक है, बना लो चाय भी।”
वंदना सेव तलने लगी, तभी पति राम की आवाज़ आई—
“वंदना! मेरे कपड़े निकालो ज़रा।”
वो काम छोड़कर भागी, माया ने जल्दी से ऑफिस का बहाना बनाकर निकलने में ही भलाई समझी।
करीब एक घंटे बाद वंदना ने सोचा कि अब आराम से बैठकर सेव खा लेगी। लेकिन जैसे ही किचन में पहुँची, प्लेट खाली मिली। सास ने मज़े से उसके हिस्से के सेव भी खा लिए थे। शरीर थकान से टूटा जा रहा था, भूख के कारण आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा। वो सोफे पर आकर ढह गई।
जब आँख खुली तो शाम के चार बज रहे थे। शरीर तप रहा था, गला सूख रहा था, और चक्कर के कारण उठना मुश्किल था। बेटा पास आया और घबराकर बोला, “मम्मी, आपको तो तेज़ बुखार है।”
सास ने सुनकर ताना मारा, “आजकल की बहुएँ ज़रा-सी बीमारी में बिस्तर पकड़ लेती हैं। हमारे ज़माने में तो ये सब नखरे नहीं चलते थे।”
बाबूजी ने धीरे से कहा, “देखो ज़रा, कुछ तकलीफ़ तो नहीं उसे?”
मगर उनकी आवाज़ घर की चहल-पहल में दब गई।
राम जब लौटे तो बस इतना पूछा, “दवा ली?”
वंदना ने धीमे स्वर में कहा, “नहीं, सुबह से कुछ खाया ही नहीं… खाली पेट दवा कैसे खाती।”
राम झुँझला उठे, “हर वक्त बीमारी का बहाना! करती ही क्या हो तुम? सब औरतें घर का काम करती हैं, तुम कोई अलग नहीं हो।”
वंदना ने कुछ नहीं कहा। आँखें बंद कर लीं, लेकिन दिल में पुराने दिन याद आने लगे। मायके में जब वो बीमार पड़ती थी, तो माँ रसोई में उसकी पसंद की चीज़ बनाती थी। बाबूजी दफ़्तर से आकर हाल पूछते, माथा छूकर देखते। भाई-बहन उसके आसपास मंडराते रहते। यहाँ? कोई उसके हिस्से की रोटी तक पूछने वाला नहीं।