मेरे कानों में मानो मधु घुल गया। आँखों से आँसू छलक आए।
मैंने फोन काटा और सुमन की ओर देखा। होंठों पर मुस्कान थी, पर आँखों में भीगते मोती।
“सुना सुमन? वो ‘सैकड़ों’ ख्वाब… जो रातों की ‘दहाई’ नींद के चोर घंटों में जन्मे थे… उन्होंने पंख फैलाना शुरू कर दिया।”
सुमन ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी आँखों की चमक, थकान के बीच उम्मीद की नदी जैसी थी।
“हाँ, पर इस जीत की कीमत तो ये ‘हजारों’ दर्द चुका रहे हैं न?”
जीवन का सत्य
मैंने खिड़की से बाहर इशारा किया। एक फूलवाला टूटी साइकिल पर गुलाब सजा रहा था। उसके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि एक अदम्य मुस्कान थी।
“देखो सुमन,” मैंने कहा, “ज़िंदगी का मज़ा इसी में है। रात की ‘ईकाई’ नींद, दिन के ‘सैकड़ों’ ख्वाब, शरीर के ‘हजारों’ दर्द… और इन सबके बीच, दिल की ‘लाखों’ उम्मीदें। यही तो है जीवन का सत्य— विरोधाभासों का सुंदर गुलदस्ता।”
तभी डॉक्टर के कमरे से मेरा नंबर पुकारा गया।
सुमन ने मेरा हाथ थामा।
“चलो, इस ‘हजारों’ दर्द की फौज से कुछ तो हार माननी पड़ेगी। फिर लौटकर आकाश के ‘सैकड़ों’ ख्वाबों वाले रोबोट पर काम करेंगे।”
मैं लाठी टेकते हुए उठा। दर्द ने फिर कसकर ज़ोर लगाया। पर आज वह कसक सिर्फ़ दर्द नहीं थी। वह सबूत थी— कि मैं जीवित हूँ, लिख सकता हूँ, प्यार कर सकता हूँ।
जीवन की मिठास कहीं उसके खट्टेपन में ही छिपी होती है। और उद्देश्य? वही है, जब हम अपने टूटे घुटनों के बावजूद सपनों के पहाड़ पर चढ़ने का साहस जुटाते हैं।