रात का वही सन्नाटा था, जो शहर की भीड़-भाड़ से परे होकर भी आदमी के भीतर तक गूंजता है। दीवार पर टंगी पुरानी घड़ी ने टनटनाहट के साथ डेढ़ बजने का ऐलान किया। कमरे के भीतर बस पंखे की घुरघुराहट थी और बिस्तर की तपिश।
मैंने करवट बदली। दाहिना घुटना फिर जैसे किसी लोहे की कील से जकड़ गया हो। दर्द की लहरें नसों में ऐसे दौड़ रही थीं जैसे हजारों की फौज तलवारें भाँज रही हो।
“अरे भगवान… ये गठिया का दर्द तो जैसे हर रात मेरा पीछा करता है,” मेरे होंठों से कराह निकल पड़ी।
पास ही बिस्तर पर सुमन सो रही थी। मेरी कराह सुनकर उसने करवट बदली। आँखें अब भी नींद से भरी हुई थीं, पर चेहरे पर चिंता साफ थी।
“फिर नींद उड़ी?” उसने धीमे स्वर में पूछा।
मैं हँसा, पर हँसी में कड़वाहट थी।
“हाँ… ये नींद तो हमेशा ऐसे ही शर्मा जाती है, जैसे मैं कोई अनचाहा मेहमान हूँ।”
सुमन झटके से उठ बैठी। उसकी उंगलियाँ मेरे घुटने पर फिसलने लगीं। उसने धीरे-धीरे मालिश करनी शुरू की। उसकी हथेलियों की गर्मी और उँगलियों की थरथराहट मेरे दर्द से कहीं अधिक गहरी बात कह रही थी— यह कि साथ निभाने के लिए सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि धैर्य भी चाहिए।
“कल डॉक्टर को दिखाना ही होगा,” उसने कहा। “ये ‘हजारों’ दर्द रोज़ नए बहाने ढूंढते रहते हैं।”