जब होश आया तो सबसे पहले कानों में बीप-बीप की मशीन की आवाज़ पड़ी। आँखें खोलीं तो धुंधली-सी आकृति दिखी। धीरे-धीरे सब साफ़ हुआ तो पता चला कि मैं अस्पताल के आईसीयू में लेटा हूँ। नाक में ऑक्सीजन की नली, हाथ में सलाईन और शरीर पर दर्जनों तार जुड़े थे। साँस लेना भारी लग रहा था।
मैंने चारों ओर नज़र दौड़ाई। सफ़ेद दीवारें, एंटीसेप्टिक की गंध और कमरे में पसरी अजीब-सी खामोशी। तभी मेरी माँ मेरी ओर दौड़ी आईं। उनकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गई थीं। उन्होंने मेरा माथा चूमकर कहा—
“बेटा, भगवान ने तुझे दूसरी ज़िंदगी दी है।”
मैंने बमुश्किल होंठ हिलाए—
“क्या… हुआ था?”
माँ ने आँसू पोंछे और चुप हो गईं। शायद कुछ कहना उनके लिए आसान नहीं था। तभी डॉक्टर अंदर आए और बोले—
“आप बहुत लकी हैं। जिस हाल में आपको यहाँ लाया गया था, उसके बाद बचना लगभग नामुमकिन था। लेकिन किसी ने वक़्त रहते आपको हॉस्पिटल पहुँचा दिया।”
मैं हक्का-बक्का रह गया। याददाश्त पर ज़ोर डाला। याद आया—कल रात मैं अपने ऑफिस से देर तक काम करके निकल रहा था। सड़कें सुनसान थीं। मैंने गाड़ी निकाली। फिर अचानक जैसे किसी ने सामने छलाँग लगाई। ब्रेक दबाने का मौका तक नहीं मिला। गाड़ी बुरी तरह हिली और उसके बाद सब काला अंधेरा…
लेकिन… मुझे अस्पताल कौन लाया?
कुछ दिन बाद जब मैं थोड़ा संभला तो पत्नी आराधना मेरे पास बैठी थी। मैंने उससे पूछा—
“तुम्हें किसने खबर दी थी? मुझे यहाँ कौन लेकर आया?”
आराधना कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से बोली—
“एक अनजान आदमी… शायद कोई राहगीर। उसने ही तुम्हें खून से लथपथ देखा। खुद भी चोटिल था लेकिन किसी तरह तुम्हें उठाकर टैक्सी रोकी और अस्पताल लाया। टैक्सी का किराया भी उसने ही चुकाया।”
मैंने हैरानी से कहा—
“पर कौन था वो? नाम? पता?”
आराधना ने सिर हिलाया—
“हमें कुछ नहीं पता। उसने अपना नाम तक नहीं बताया। बस तुम्हारा मोबाइल निकाला, मेरी कॉल लिस्ट देखी और मुझे फोन किया। फिर चुपचाप चला गया।”
मेरा दिल और बेचैन हो उठा। कौन हो सकता है वो शख्स?
दिन बीतते गए। मैं धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा। लेकिन हर दिन दिमाग़ में वही सवाल घूमता रहा—वो अनजान हाथ कौन था जिसने मेरी साँसें लौटा दीं?