रणविजय ने सैकड़ों गुंडे इकट्ठे किए। एक रात कॉलेज के मैदान में हमला हुआ। गोलियाँ बरसने लगीं। पर अग्निवीर अकेला खड़ा रहा। उसकी तलवार चमकी, मुक्के गरजे और दुश्मनों के शव ज़मीन पर गिरते चले गए। लोग कहते हैं उस रात मैदान खून से लाल हो गया था।
लेकिन असली झटका तब लगा जब रणविजय ने अग्निवीर की बहन अनन्या को अगवा कर लिया। यह सुनकर अग्निवीर की आँखें खून से भर गईं।
वह सीधे रणविजय के अड्डे पर पहुँचा। वहाँ सौ से ऊपर हथियारबंद लोग खड़े थे। पर अग्निवीर की चाल में रुकावट नहीं थी। एक-एक कर सभी को धराशायी करता गया। उसके हर वार के साथ उसकी माँ की याद, उसके हर मुक्के के साथ पिता की चिता का धुआँ गूंजता था।
आखिरकार रणविजय उसके सामने आया। उसने अनन्या की गर्दन पर चाकू रखा और बोला —
“तू कितना भी शेर बने, तेरे जैसे जंगली शहर की राजनीति को नहीं बदल सकते। यहाँ हमेशा गीदड़ ही राज करते हैं।”
अग्निवीर ने गरजते हुए जवाब दिया —
“शेर भूख से नहीं, खून से लड़ता है… और मैंने अपनी प्यास बचपन से दबाकर रखी है। अब तेरा वक़्त खत्म हुआ।”
उसने बिजली की रफ्तार से वार किया और रणविजय का खेल वहीं खत्म हो गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
रणविजय की मौत के बाद विक्रम चौहान खुद मैदान में उतरा। उसके पास न सिर्फ़ राजनीति की ताक़त थी बल्कि पुलिस और बाहरी हथियारबंद गैंग भी। उसने पूरे शहर को जकड़ने की कोशिश की। लेकिन इस बार अग्निवीर अकेला नहीं था। पूरा शहर उसके साथ खड़ा था।
लोग उसके पीछे चिल्ला रहे थे —
“अग्निवीर जिंदाबाद! इंसाफ़ चाहिए, इंसाफ़ चाहिए!”
आखिरी जंग विधानसभा के बाहर हुई। गोलियों की गड़गड़ाहट, बम धमाके, और हजारों लोग सड़कों पर। अग्निवीर ने दुश्मनों की हर दीवार तोड़ डाली। और आखिरकार विक्रम चौहान को पकड़कर जनता के सामने लाया।
उसने उसकी कॉलर पकड़कर दहाड़ मारी —
“ये तेरे पाप का हिसाब है। तूने मेरे माँ-बाप छीने थे। अब मैं तुझसे तेरी सत्ता और तेरी साँसें छीनूँगा।”
और अग्निवीर ने उसी जगह चौहान का अंत कर दिया।
उस दिन से कृष्णपुर का चेहरा बदल गया। अब कॉलेज में पढ़ाई होने लगी, सड़कों पर सुरक्षा लौटी और लोग पहली बार बिना डर के जीने लगे।
अग्निवीर को लोग भगवान मानने लगे, लेकिन उसने सिर्फ़ इतना कहा —
“मैं भगवान नहीं हूँ… मैं उस आग का बेटा हूँ, जिसे तुमने बुझाने की कोशिश की थी। और जब तक अन्याय रहेगा, यह आग जलती रहेगी।”