असल में, कई साल पहले विक्रम चौहान ने एक निर्दोष नेता सूर्यकांत शर्मा को चुनाव के दौरान ज़िंदा जला दिया था। वह आदमी ईमानदारी का प्रतीक था और लोगों का चहेता भी। लेकिन उसकी ईमानदारी चौहान परिवार की राजनीति के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट थी। उसकी मौत को “दुर्घटना” बता कर मामला दबा दिया गया था। उस रात सूर्यकांत की पत्नी को भी जहर देकर खत्म कर दिया गया।
पर एक छोटा बच्चा बच गया था। वह बच्चा था — अग्निवीर।
बचपन में उसने अपनी माँ की लाश और बाप की जलती चिता देखी थी। उस रात उसने कसम खाई थी —
“मैं आग से पैदा हुआ हूँ… और आग ही बनकर लौटूँगा। जिनके हाथ मेरे माँ-बाप के खून से रंगे हैं, उनकी बर्बादी मेरा जीवन होगा।”
अग्निवीर ने खुद को न सिर्फ ताक़तवर बनाया, बल्कि पढ़ाई-लिखाई में भी माहिर हो गया। वह जानता था कि सिर्फ़ हथियार से नहीं, दिमाग़ से भी लड़ाई जीतनी पड़ती है।
कृष्णपुर में उसकी वापसी एक इत्तेफ़ाक़ नहीं थी। उसने कॉलेज को चुना क्योंकि वहीं से रणविजय और उसका मंत्री बाप अपनी सत्ता चलाते थे। अग्निवीर की हर चाल सोच-समझकर थी।
उसका सबसे बड़ा साथी था उसका जिगरी दोस्त अर्जुन। अर्जुन भले ही शारीरिक रूप से अग्निवीर जितना ताक़तवर नहीं था, लेकिन दिमाग से बेहद चालाक था। दोनों ने मिलकर विक्रम चौहान के धंधों पर वार करना शुरू किया।
एक रात शहर में चौहान के शराब के गोदाम में धमाका हुआ। लाखों का माल जलकर राख हो गया। अगली सुबह अवैध हथियारों की खेप पुलिस के हाथ लगी। और फिर देखते ही देखते कई भ्रष्ट अफसरों की सीक्रेट लिस्ट मीडिया तक पहुँच गई।
हर जगह नाम आ रहा था — “अग्निवीर।”
विक्रम चौहान का गुस्सा अब आसमान छू रहा था। उसने सीधे अपने बेटे रणविजय को आदेश दिया —
“उस लड़के को खत्म करो। वरना हमारी राजनीति खत्म हो जाएगी।”