शहर का नाम था कृष्णपुर। बाहर से देखने में ये जगह आम शहर जैसा लगता था — चमकती गाड़ियाँ, बड़ी-बड़ी इमारतें, कॉलेजों में पढ़ते बच्चे और नेताओं के होर्डिंग्स से भरी दीवारें। लेकिन भीतर से यह शहर सड़ा हुआ था। हर गली पर गुंडों का कब्ज़ा, हर सड़क पर नेताओं का राज और हर कॉलेज में अपराध का खेल चलता था।
कृष्णपुर के सबसे बड़े कॉलेज पर राज करता था रणविजय चौहान। वह राज्य के शिक्षा मंत्री विक्रम चौहान का बेटा था। मंत्री का पैसा और पुलिस का संरक्षण रणविजय की ढाल था। पूरे कॉलेज में उसकी दहशत थी। कोई लड़की हँस दे तो उसका अपमान, कोई लड़का आँख मिलाए तो उसकी हड्डियाँ तोड़ दी जाती थीं। स्टूडेंट्स का जीवन पढ़ाई से ज़्यादा डर में बीतता था।
लेकिन यह डर ज्यादा दिनों तक टिकने वाला नहीं था।
एक दिन कॉलेज के गेट पर एक लड़का दाखिल हुआ। लंबा-चौड़ा कद, आँखों में गहरी चमक और चेहरे पर ऐसी खामोशी कि लगता था जैसे अंदर आग भरी है। उसका नाम था अग्निवीर। उसने बैग कंधे पर डाला, लेकिन चाल से साफ़ झलक रहा था कि यह कोई आम लड़का नहीं है।
पहली भिड़ंत उसी दिन हो गई। रणविजय अपने गुंडों के साथ कैंटीन में बैठा लड़कियों को परेशान कर रहा था। अचानक अग्निवीर ने आगे बढ़कर उसकी कलाई पकड़ ली। कैंटीन में सन्नाटा छा गया। सबको लगा कि अब यह लड़का खत्म है। लेकिन कुछ ही सेकंड में नज़ारा बदल गया। रणविजय के गुंडे ज़मीन पर कराह रहे थे, और रणविजय का मुँह खून से लथपथ था। पहली बार किसी ने उसकी नाक तोड़ी थी।
उस दिन से पूरा कॉलेज गूंजने लगा —
“अग्निवीर आया है… अकेला ही सौ पर भारी।”
रणविजय ने यह खबर अपने बाप विक्रम चौहान तक पहुँचाई। मंत्री ने पहली बार सोचा कि यह कोई मामूली लड़का नहीं है। उसके चेहरे की चिंता बताती थी कि उसे अपने पुराने पाप याद आ रहे हैं।