रात के साढ़े बारह बजे थे। पुरानी हवेली की खिड़कियों से आती हवा डरावनी आवाज़ कर रही थी। नीलिमा पहली बार अपने ससुराल की इस हवेली में आई थी। शादी को सिर्फ़ पाँच दिन हुए थे। बाहर से देखने में हवेली शाही लगती थी, लेकिन भीतर अजीब-सी वीरानी थी।
नीलिमा का पति, आदित्य, बिज़नेस के काम से शहर से बाहर गया था। उसने जाते वक्त बस इतना कहा था—
“तुम बिल्कुल चिंता मत करना, माँ-पापा और परिवार सब यहीं हैं।”
लेकिन हवेली में रहते हुए नीलिमा को महसूस हुआ, यहाँ कुछ तो अजीब है। घर के लोग दिखते तो थे, पर उनकी आँखों में जैसे कोई गहरा राज़ छुपा था।
पहली रात जब वह अपने कमरे में सो रही थी, तभी हवेली के पिछले हिस्से से एक चीख़ सुनाई दी। नीलिमा हड़बड़ाकर उठी। खिड़की से झाँककर देखा तो सब अंधेरा था। सोचा—शायद सपना होगा। लेकिन दूसरे दिन जब उसने सास से पूछा, तो वह चौंक गई।
“कैसी चीख़? यहाँ तो कोई आवाज़ नहीं आई।”
ससुर ने भी अनजान बनते हुए कहा—
“बेटी, पुरानी हवेली है। हवा की आवाज़ को लोग अक्सर चीख़ समझ बैठते हैं।”
नीलिमा को तसल्ली नहीं हुई।