लखनऊ की ठंडी रात थी। विकासनगर का ब्लैक शैडो कैफ़े रोशनी और धुएँ से भरा हुआ था।
युवा अपने दोस्तों के साथ हुक्के के कश ले रहे थे, मानो यह कोई पार्टी हो।
लेकिन तभी पुलिस की गाड़ियाँ कैफ़े के बाहर आकर रुकीं।
पल भर में अंदर अफरा-तफरी मच गई, हर कोई दरवाजे की ओर भागने लगा।
पुलिस ने मौके से 12 लोगों को दबोच लिया।
इनमें एक नाबालिग भी शामिल था, जो स्कूल ड्रेस में हुक्का पी रहा था।
टेबलों पर पड़े शीशे के हुक्के, चिलम, पाइप और फ्लेवर तंबाकू सब जब्त कर लिए गए।
कैफ़े का संचालक राधेलाल भाग निकला, लेकिन उसका धंधा पुलिस की नज़र से बच न सका।
यह पहला मामला नहीं था।
इससे पहले भी पुलिस ने कई हुक्का बार पर कार्रवाई की थी।
जनवरी और फरवरी में ही लखनऊ में कई जगह छापे पड़े।
बाजारखाला का होटल कासा, इंदिरानगर का ब्लैकयार्ड, गोमतीनगर का पेबल्स बिस्ट्रो — सब सील हो चुके थे।
दरअसल, हुक्का बार अब सिर्फ “तंबाकू पीने की जगह” नहीं रहे।
ये युवाओं के लिए नई पार्टी स्पॉट बन गए हैं।
हल्की नीली रोशनी, धीमा म्यूज़िक और सुगंधित फ्लेवर का धुआँ —
युवाओं को ऐसा लगता है मानो वे किसी विदेशी लाउंज में बैठे हों।