दोस्तों का ग्रुप एक हुक्का टेबल पर मंगवाता है।
बारी-बारी से कश लेते हैं और घंटों वहीं समय बिताते हैं।
गांवों की चौपाल में जो हुक्का मेलजोल का प्रतीक था,
वही अब शहरी बार और कैफ़े में महंगी “लाइफ़स्टाइल” बन गया है।
मुगल काल में जहां हुक्का नवाबों और राजाओं की शान माना जाता था,
आज वही युवाओं की नाइटलाइफ़ का हिस्सा बन चुका है।
लेकिन इस चमक-दमक के पीछे खतरे भी छिपे हैं।
फ्लेवर्ड हुक्कों में कई बार तंबाकू और नशीली चीजें भी मिलाई जाती हैं।
नाबालिग बच्चे स्कूल की ड्रेस में हुक्का बार पहुँच जाते हैं।
यह पुलिस और सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय है।
इसी वजह से नए कानून आए हैं।
अब यूपी में अवैध हुक्का बार चलाने पर तीन साल की जेल और भारी जुर्माना हो सकता है।
21 साल से कम उम्र वालों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है।
रेस्तरां और सार्वजनिक जगहों पर हुक्का परोसने की सख्त मनाही है।
सिर्फ अलग लाइसेंस लेकर ही कोई हुक्का लाउंज चला सकता है।
लेकिन ज्यादातर संचालक इस नियम की अनदेखी करते हैं।
नतीजा यह है कि पुलिस को बार-बार छापेमारी करनी पड़ती है।
कई बार यह कार्रवाई अचानक होती है, ताकि संचालक तैयारी न कर पाए।
हुक्का बार कभी मेलजोल और आराम की जगह थे।
अब वे कानून और अपराध की गिरफ्त में आते जा रहे हैं।
युवाओं के लिए यह जगह मनोरंजन का साधन है।
लेकिन समाज के लिए यह एक नया सिरदर्द बन चुका है।