शहर का एक बड़ा कॉलेज। दोपहर की गर्मी बहुत तेज थी। हवा में लपटें जैसी तपिश थी। कॉलेज के आँगन में एक आदमी पसीने से भीगा हुआ घास की कटाई कर रहा था। उसका नाम था रामेश्वर। वह कॉलेज का माली था। मेहनत से उसका बदन टूट रहा था, लेकिन चेहरे पर बेटी के भविष्य की चिंता और उम्मीद हमेशा रहती थी।
अचानक कॉलेज का एक चपरासी दौड़ता हुआ आया। उसने हाँफते हुए कहा— “रामेश्वर! प्रिंसिपल मैडम तुम्हें तुरंत ऑफिस बुला रही हैं।” यह सुनते ही रामेश्वर का दिल धक से रह गया। उसे लगा शायद उससे कोई गलती हो गई है। या फिर उसकी बेटी ने कुछ ऐसा कर दिया है जिससे कॉलेज में शिकायत पहुँची है।
उसने जल्दी से हाथ धोए और पसीना पोंछा। उसके कदम भारी लग रहे थे। हर कदम जैसे डर से बोझिल था। वह धीरे-धीरे प्रिंसिपल के ऑफिस पहुँचा।
दरवाजे पर पहुँचते ही प्रिंसिपल की गंभीर आवाज़ आई— “आ जाओ, रामेश्वर।” वह काँपते हुए कमरे में दाखिल हुआ। सिर झुका हुआ था। उसने डरते हुए कहा— “मैडम, अगर कोई गलती हो गई हो तो माफ कर दीजिए। आपने तो मेरी बेटी को मुफ्त में पढ़ने का मौका दिया है। मैं पहले से ही आपका ऋणी हूँ।”
प्रिंसिपल की मेज़ पर एक कागज़ रखा था। उन्होंने इशारा करते हुए कहा— “इसे देखो।” रामेश्वर घबरा गया। उसने धीरे से कहा— “मैडम, मैं अंग्रेज़ी नहीं पढ़ सकता।”
प्रिंसिपल हल्का मुस्कुराईं और बोलीं— “तुम इतना क्यों डर रहे हो? रुको… तुम्हारी बेटी की क्लास-टीचर आ रही हैं।”
कुछ ही देर में क्लास-टीचर कमरे में पहुँचीं। उनके हाथ में वही कागज़ था। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा— “आज बच्चों को एक निबंध लिखने को कहा गया था— ‘मेरी माँ’। सुनो, तुम्हारी बेटी ने क्या लिखा है।”
शब्द पढ़े जाने लगे। कमरे का माहौल बदल गया।
“मेरी माँ अब इस दुनिया में नहीं हैं। जब मैं पैदा हुई थी, उसी समय उन्होंने अंतिम साँस ली। मुझे गोद में लेने वाला पहला इंसान मेरे पिताजी थे। लोग कहते थे कि मैं अशुभ हूँ, माँ को खा गई। लेकिन मेरे पिताजी ने मुझे कभी ऐसे नहीं देखा।”
रामेश्वर के आँसू छलक पड़े। पर बेटी की लिखाई अभी बाकी थी।