“परिवार वालों ने पिताजी से कहा कि दूसरी शादी कर लो और एक बेटा पैदा कर लो। मगर उन्होंने साफ़ मना कर दिया। तब दादा-दादी ने उन्हें घर से निकाल दिया। पिताजी सब कुछ छोड़कर सिर्फ़ मुझे लेकर इस शहर आ गए। यहाँ उन्होंने बगीचों में काम करना शुरू किया और मुझे माँ और पिता दोनों का प्यार दिया।”
“अब समझ में आता है कि जब भी आखिरी रोटी बचती थी, पिताजी कहते— ‘मुझे भूख नहीं है।’ असल में वो त्याग था। जब भी मुझे नए कपड़े चाहिए होते थे, पिताजी कहते— ‘मुझे यह रंग पसंद नहीं।’ असल में वो मेरी खुशी के लिए उनका प्यार था।”
“अगर माँ का मतलब देखभाल है— तो मेरे पिताजी मेरी माँ हैं। अगर माँ का मतलब त्याग है— तो मेरे पिताजी सबसे बड़ी माँ हैं। अगर माँ का मतलब आँचल की छाया है— तो वह छाया मेरे पिताजी ने दी है।”
“आज मदर्स डे पर, मैं अपनी माँ को नहीं, अपने पिताजी को प्रणाम करती हूँ। मेरे पिताजी ही मेरी दुनिया की सबसे महान माँ हैं।”
कागज़ पढ़ते-पढ़ते क्लास-टीचर की आवाज़ रुक गई। उनकी आँखें भी भर आईं। कमरे में सन्नाटा छा गया। रामेश्वर फूट-फूटकर रो पड़ा। उसने काँपते हाथों से वह कागज़ लिया और सीने से लगा लिया।
प्रिंसिपल ने धीरे से कहा— “रामेश्वर, तुम्हारी बेटी को इस निबंध के लिए पूरे अंक मिले हैं। कल कॉलेज में मदर्स डे का बड़ा कार्यक्रम है। और इस साल के मुख्य अतिथि तुम रहोगे।”
रामेश्वर चौंक गया। उसकी आँखें फटी रह गईं। उसने सोचा— “मैं… एक माली… कॉलेज का मुख्य अतिथि?”
प्रिंसिपल ने आगे कहा— “क्योंकि तुमने साबित किया है कि माँ होना सिर्फ़ एक स्त्री होना नहीं है। माँ होना मतलब है निस्वार्थ प्रेम, त्याग और समर्पण। और तुमने अपनी बेटी के लिए वही किया है।”
रामेश्वर खिड़की से बाहर झाँकने लगा। उसकी बेटी कक्षा में बैठी थी, किताबों में खोई हुई। मासूम चेहरा, आँखों में चमक। रामेश्वर का मन भर आया। उसने मन ही मन कहा— “बेटी, आज तुमने अपने पिता को सच्चा माँ बना दिया।”
अगले दिन जब रामेश्वर मंच पर पहुँचा, तो पूरा कॉलेज तालियों से गूंज उठा। हर छात्र और शिक्षक उसकी ओर सम्मान से देख रहा था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन इस बार यह आँसू गर्व के थे।