सुबह का समय था। ऑफिस की घड़ी ने अभी नौ ही बजाए थे। राजीव बाबू तेज़ कदमों से अंदर आए और जैसे ही कुर्सी खींचकर बैठने लगे, रिसेप्शन का फोन लगातार बजने लगा। पहली घंटी पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया, दूसरी पर माथा पकड़ लिया और तीसरी घंटी आते-आते रिसेप्शनिस्ट रिसीवर उनके सामने बढ़ा चुकी थी। अनमने ढंग से फोन उठाते ही उधर से एक स्त्री स्वर गूँजा—दृढ़ लेकिन मधुर—“नमस्ते सर, मैं आपकी बेटी काव्या की क्लास टीचर बोल रही हूँ। आज उसकी प्रगति रिपोर्ट दिखाने के लिए माता-पिता की मीटिंग रखी गई है, आप ज़रूर आइएगा।” कुछ पल के लिए राजीव बाबू चुप हो गए। उनकी आँखें सामने रखे फाइलों के ढेर पर अटक गईं। ऑफिस में ढेरों काम थे, लेकिन बेटी की आवाज़ और चेहरे की मासूमियत अचानक याद आ गई। दिल और दिमाग में कुछ देर तक संघर्ष चलता रहा और आखिरकार उन्होंने गहरी साँस लेकर कहा—“जी मैम, मैं आता हूँ।”
घर पहुँचते ही उन्होंने देखा कि काव्या पहले से ही स्कूल ड्रेस पहनकर घबराई-सी खड़ी थी। उसके चेहरे पर मासूम चिंता थी। उसने धीमे स्वर में कहा—“पापा, आज रिपोर्ट कार्ड मिलेगा…टीचर डाँटेंगी तो नहीं?” राजीव बाबू मुस्कुराए और उसके गाल थपथपाते हुए बोले—“डाँट पड़ी तो दोनों की क्लास लगेगी—तेरी भी, मेरी भी।” उनकी हँसी से काव्या का डर थोड़ा कम हुआ और वह पापा का हाथ पकड़कर स्कूल चल दी।
कक्षा का माहौल तनावपूर्ण था। हर बच्चा अपने माता-पिता के साथ सहमा हुआ बैठा था। सामने नीली सिल्क की साड़ी पहने, जूड़े में बंधे बालों और आँखों में तेज़ लिए मिसेज वर्मा बैठी थीं। उनकी आवाज़ में कड़कपन था और चेहरा इस तरह सख़्त कि कोई भी उनसे सीधे देखने की हिम्मत न जुटा पाए। राजीव बाबू ने नम्रता से प्रणाम किया लेकिन जवाब में आया स्वर ठंडा और आदेशात्मक था—“पहले आप पीछे बैठिए, बाद में बुलाऊँगी।” काव्या ने पापा का हाथ दबाते हुए धीरे से कहा—“पापा, देखना आज तो बुरी तरह डाँट पड़ेगी।” राजीव बाबू ने हँसकर कान में कहा—“तो फिर डाँट दोनों की लगेगी।”