दिन बीते, और आखिर वह फोन आया—“आपका चयन हो गया है। आप अगले सोमवार से काम पर जुड़ सकती हैं।” फोन रखते ही अनिता की आँखों से आँसू बह निकले। उसने तुरंत पिताजी के चरण छुए।
पहली तनख्वाह भले ही छोटी थी, लेकिन जब उसने उसे ससुर जी के हाथों में रखा, तो उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने बहू को गले लगाया और कहा—“आज तूने घर की बेटी बनकर इस घर को बचा लिया।”
धीरे-धीरे अनिता की मेहनत रंग लाने लगी। गाँव के वही लोग, जो कभी ताने कसते थे, अब तारीफ़ करने लगे। दूधवाला, किराने वाला—सबकी आवाज़ का लहजा बदल गया। अब कोई तकादा नहीं करता था, बल्कि मुस्कुराकर कहता—“बहू जी, आप जैसी हिम्मतवाली औरतें बहुत कम होती हैं।”
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। असली जंग अभी बाकी थी। सुनील को यह सब रास नहीं आ रहा था। उसे लगता कि उसकी इज्ज़त कम हो रही है। एक दिन उसने ताना मारा—“अब तो तू कमा रही है, तो मैं बेकार हो गया? लोगों के सामने मैं छोटा हो गया।”
अनिता ने उसकी आँखों में देखकर धीरे से कहा—“सुनील, मैं यह सब तुम्हें छोटा दिखाने के लिए नहीं कर रही। मैं यह कर रही हूँ ताकि हमारा घर बचा रहे। ताकि हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहे।”
सुनील चुप रहा, लेकिन भीतर ही भीतर उसका अहंकार उसे कचोटता रहा। अनिता जानती थी कि असली लड़ाई समाज से नहीं, बल्कि अपने ही घर के भीतर से है। लेकिन उसने यह भी तय कर लिया था कि अब चाहे कुछ भी हो, वह पीछे नहीं हटेगी।
बरसों बाद, जब पिताजी का देहांत हुआ, तो पूरे गाँव ने कहा—“इस बहू ने अपने बूढ़े ससुर की सेवा भी की और घर भी संभाला। ऐसी बहू किस्मत वालों को मिलती है।” अनिता की आँखें उस दिन नम थीं, लेकिन दिल में सुकून था कि उसने अपने वचन को निभाया।
समय बीतता गया। उसकी नौकरी अब पदोन्नति में बदल गई। घर में अब कर्ज़ नहीं था। बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने लगे। धीरे-धीरे सुनील भी उसकी मेहनत को समझने लगा। एक रात उसने चुपचाप कहा—“अनिता, शायद मैं गलत था। तूने जो किया, वह सच में बड़ा काम था।”
अनिता ने उसकी ओर देखा, और बस इतना कहा—“गलतियाँ इंसानों से ही होती हैं, सुनील। लेकिन जब तक इंसान उन्हें स्वीकार कर ले, तब तक सब ठीक हो जाता है।”
उस रात दोनों की आँखों में नींद नहीं थी। वे खामोशी से एक-दूसरे को देखते रहे। बाहर आसमान में चाँद था, और भीतर घर में एक नयी रोशनी।