गाँव का एक साधारण किसान था हरनाम। ज़्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था, पर ईमानदार और मेहनती था। उसकी पत्नी का देहांत हो चुका था और घर में उसका एक नन्हा बेटा ही उसकी पूरी दुनिया था। हरनाम अपनी दिन-रात की मेहनत उसी बच्चे के लिए करता। खेतों में काम करता, लकड़ियाँ काटकर लाता और रात को थका-हारा जब अपने आँगन में बैठता तो बच्चे की मासूम हँसी उसकी सारी थकान मिटा देती। घर के आँगन में एक पालतू नेवला भी रहता था। नेवला खुद-ब-खुद उनके घर आकर बस गया था। हरनाम उसे कभी-कभी दूध रोटी डाल देता। धीरे-धीरे वो भी घर का हिस्सा बन गया। पड़ोस की औरतें कहतीं—“भाई हरनाम, ये नेवला बड़ा काम का है। साँप-वाँप दिखेगा तो यही निपट लेगा।” हरनाम मुस्कुराकर जवाब देता—“हाँ, ठीक कहते हो। मेरे बच्चे की भी देखभाल करता है जैसे।”
एक दिन दोपहर को हरनाम खेत से लौटा। गर्मी ज़्यादा थी तो उसने बच्चे को चारपाई पर सुला दिया और खुद बाहर आँगन में लकड़ियाँ काटने लगा। कुल्हाड़ी से लकड़ी चीरते हुए उसका ध्यान अपने काम में था, लेकिन तभी घर के भीतर एक अजीब सी आवाज़ उठी। साँप की फुफकार थी। अंदर झाँकने का वक्त ही नहीं मिला और उसी समय एक लंबा, ज़हरीला साँप बच्चे की ओर बढ़ रहा था। बच्चे को पता तक नहीं चला, वो नींद में मासूमियत से मुस्कुरा रहा था।
लेकिन ठीक उसी वक्त नेवला आ पहुँचा। उसकी लाल-लाल आँखों में आग जैसी चमक थी। वो फुर्ती से आगे बढ़ा और साँप के सामने आकर खड़ा हो गया। साँप फुफकारता और दाँत निकालकर वार करता, नेवला झटके से बचता और पलटवार करता। कुछ ही देर में दोनों के बीच भयंकर लड़ाई छिड़ गई। बच्चे की चारपाई के ठीक पास यह संग्राम चल रहा था। नेवला बार-बार झपटता और आखिरकार उसने साँप का सिर दबोच लिया। साँप छटपटाता रहा लेकिन नेवले ने उसकी देह को टुकड़े-टुकड़े कर दिया ताकि वह दोबारा उठ न सके। बच्चे की जान बच गई, और वो अब भी चैन से सो रहा था।