माँ के बिना मायका अधूरा लगा, पर नीम की छाँव में मिला बचपन का सहारा आँसू, यादें और ममता का अनकहा रिश्ता

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कई सालों बाद वह अपने गाँव लौटी थी। वजह भी कुछ खास थी भतीजे की शादी। वरना माँ-बाप के गुजर जाने के बाद गाँव आने का कोई खास कारण नहीं बचा था। ऐसा नहीं था कि भाई- भाभी ने बुलाया नहीं। फोन तो कई बार आए थे, पर दिल नहीं मानता था। क्या मायका माँ के बिना मायका होता है?
उसे हमेशा लगता बिना माँ के घर वही है जैसे बिना मिठास के त्यौहार, बिना संगीत का उत्सव।

गाड़ी से उतरते ही रिश्तेदारों ने उसका खूब स्वागत किया। भाई, भाभी, भतीजा, भतीजी—सब खुशी से झूमते हुए मिले। भतीजा तो जैसे बरसों की कमी पूरी करना चाहता था।
“चाची, कितने दिनों बाद आई हो! अबकी बार तो रह ही जाओगे ना? बताओ, अगर मेरी शादी यहाँ न होती तो आप गाँव आती भी?”

गुड़िया ने उसकी बातें सुनीं, पर कोई जवाब न दिया। उसकी आँखें बार-बार बरामदे से भीतर जाने वाली गली की ओर उठ रही थीं। उसी गली से बरसों पहले माँ निकलती थीं—सिर पर ओढ़नी, माथे पर शॉल, और बाँहें फैलाकर उसे गले लगाने को तैयार। आज वही गली सुनसान थी। दिल ने जैसे कह दिया—माँ नहीं रही तो मायका भी नहीं रहा।

शादी का घर था, रौनक, चहल-पहल, गाने-बजाने की आवाजें हर तरफ़ थीं। पर गुड़िया को सब अजनबी सा लग रहा था। यहाँ तक कि अपने भी। मन कहीं ठहर नहीं रहा था। तभी भाई ने उसकी हालत समझी और बोला—
“क्या तुम लोग यहीं खड़े रहोगे? पहले इसे अंदर ले चलो। सफर से आई है, थकी होगी।”

सामान उठाया गया और वह सबके पीछे-पीछे घर में चली आई। घर वही था, पर उसे महसूस हो रहा था जैसे दीवारें भी बदल गई हों। माँ-बाप के रहते घर में हर कोना मुस्कुराता था, अब वही कोने उसे चुभ रहे थे।

वह माँ के कमरे के पास रुकी। यही तो वह जगह थी जहाँ आते ही अपना पर्स फेंक देती थी, माँ से लिपट जाती थी। पर अब वह कमरा भाभी का हो गया था। भाभी की साड़ी, उनकी चुन्नी, उनकी खुशबू वहाँ फैली हुई थी। गुड़िया ने चाहा कि दरवाजे पर खटखटाए और माँ की आवाज़ सुने। पर माँ कहाँ थीं?

उसी वक्त भतीजी पास आ गई।
“बुआ, यह तो मम्मी का कमरा है। आपका सामान मेरे कमरे में है। आप मेरे साथ रहना।”

गुड़िया ने खुद को सँभाला। आँखों में उमड़े आँसुओं को दबाया और माँ के कमरे से दूर चली गई। उस कमरे से दूर… मानो यादों से दूर।

कपड़े बदलकर, हाथ-मुँह धोकर उसने घर के पिछवाड़े का रुख किया। मन में दर्द का सैलाब उमड़ रहा था। वह किसी से लिपटकर रोना चाहती थी, पर किससे? भाई-भाभी अपने काम में व्यस्त थे, मेहमानों का ताँता था। ऐसे में उसकी नजर नीम के पेड़ पर पड़ी।

Ankit Verma

अंकित वर्मा एक रचनात्मक और जिज्ञासु कंटेंट क्रिएटर हैं। पिछले 3 वर्षों से वे डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं और Tophub.in पर बतौर लेखक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। लाइफस्टाइल, टेक और एंटरटेनमेंट जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते हैं।

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