वही पुराना नीम—गाँव का गवाह, उसके बचपन का साथी। बाबूजी ने उसी पर झूला बाँधा था। उसी झूले पर बैठकर वह माँ की गोद का सुख महसूस करती थी। बाबूजी की चौपाल भी वहीं जमती थी। कहानियाँ, हँसी-मज़ाक, हिसाब-किताब सब उसी पेड़ के नीचे।
वह नीम आज भी वैसे ही खड़ा था—मजबूत, शांत, अपनी छाया फैलाए। गुड़िया उसके पास गई और तने को दोनों हाथों से पकड़ लिया। आँसुओं की झड़ी लग गई। उसने दिल खोलकर रोना शुरू किया। बरसों का दर्द, माँ की कमी, घर की वीरानी—सब उस नीम की छाल में समा गया।
उसके लिए वह पेड़ अब पेड़ नहीं, माँ की बाँहें था।
काफी देर तक वह वहीं जड़ के पास बैठी रही। तभी किसी ने कंधे पर हाथ रखा। चौंककर पलटी तो देखा—पड़ोस की चाची। वही जो माँ की सहेली थीं। जिन्हें वह कभी-कभी काकी, कभी मौसी कहकर पुकारती थी।
एक हाथ में लाठी, दूसरे में पानी का गिलास।
“बेटी, तू यहाँ क्यों छुपी है? मैं पूरे घर में तुझे ढूँढ रही थी। चल, पहले मुँह मीठा कर, पानी पी ले। फिर मुझे अपनी खबर दे।”
बस इतना कहना था कि गुड़िया की आँखें फिर छलक पड़ीं। आँसुओं के साथ उसने गिलास थाम लिया। मौसी ने आँचल से उसके आँसू पोंछे और कहा—
“बेटी, तू क्यों रोती है? तेरी माँ नहीं है तो क्या हुआ? माँ के घर का पेड़ माँ जैसा होता है। नीम की छाँव में देख—तेरी माँ ही है।”
गुड़िया ने नीम की ओर देखा। हाँ, वही तो उसकी माँ की छाया थी। वही पेड़, जिसकी डालियों से झूला झूलते हुए माँ गाती थीं—
‘नीमिया की डार मइया… झुलेली…’
अब उसे समझ आया—माँ सिर्फ देह से जाती हैं। उनकी ममता घर की दीवारों, आँगन की मिट्टी और नीम की छाँव में जिंदा रहती है।
उस शाम गुड़िया ने पहली बार अपने मायके में चैन की साँस ली। घर अब भी उसका था। माँ अब भी वहीं थीं—बस रूप बदलकर।