अनूप बहाना बनाकर भाग निकला, लेकिन आराध्या पकड़ी गई।
पुलिस कस्टडी में आराध्या से सख्ती से पूछताछ हुई। आखिरकार उसने सब उगल दिया। उसने बताया कि वह और अनूप लंबे समय से गुपचुप मिलते थे। रात को अक्सर अनूप घर में आता था। एक दिन उसके पिता ने उन्हें रंगे हाथ पकड़ लिया। मोहनलाल ने गुस्से में अनूप के खिलाफ पुलिस में बयान दिलवाया कि उसने जबरदस्ती की।
अनूप को जेल भेज दिया गया। क्योंकि आराध्या नाबालिग थी, उसे उम्रकैद हो सकती थी। लेकिन बीस दिन बाद आराध्या ने कोर्ट में बयान बदलकर अनूप को छुड़वा लिया।
इस घटना के बाद मोहनलाल का विश्वास टूट गया। उसने आराध्या को गांव भेज दिया। लेकिन आराध्या और अनूप का रिश्ता और गहरा हो गया। मोहनलाल अब सबको लेकर गांव शिफ्ट होने की तैयारी कर रहा था। यही बात आराध्या को नागवार गुज़री। उसे लगा अगर गांव गए तो वह अनूप से नहीं मिल पाएगी।
यहीं से उसने अनूप के साथ मिलकर अपने ही पिता की हत्या की साज़िश रच डाली।
पूछताछ में आराध्या ने बताया कि हत्या की रात जब अनूप ने कुल्हाड़ी से मोहनलाल के सिर पर वार किया, तो वह चीख़ पड़ी। चीख सुनकर कनिष्क वहां पहुंच गया। अनूप ने उसे भी मार डाला। इसके बाद दोनों ने बर्तन में खाना खाया और अगरबत्तियाँ जलाकर शव छुपाने की कोशिश की।
लेकिन अपराध कितना भी छुपाया जाए, सच सामने आता ही है। कुछ ही दिनों बाद अनूप भी पुलिस के हत्थे चढ़ गया।
यह कहानी सिर्फ एक हत्या की दास्तान नहीं है। यह एक पिता के सपनों के टूटने की, एक परिवार के बिखरने की और अंधे प्रेम में बहक चुकी एक बेटी की दर्दनाक गाथा है।
मोहनलाल ने अपनी इच्छाएँ दबाकर बच्चों को खुश रखने की कोशिश की। पर वही बेटी जिसने उसकी उम्मीदों का सहारा होना था, उसकी मौत का कारण बन गई।
समाज के लिए यह सबक है कि कम उम्र में गलत रिश्ते और गलत फैसले सिर्फ परिवार नहीं, पूरी ज़िंदगी तबाह कर सकते हैं।