रात के नौ बज चुके थे और ऑफिस की खिड़की से बाहर झांकती मीना ने देखा कि पूरा शहर रोशनी में नहा रहा है। पर उसके लिए ये रोशनी एक चिंता का कारण थी, क्योंकि वह देर से घर निकल रही थी। उसकी माँ लगातार फोन कर रही थीं और पापा का संदेश भी आ चुका था “बेटा, देर हो रही है, जल्दी घर निकलो।” मीना ने फाइलें समेटीं, लैपटॉप बैग में रखा और नीचे आकर बड़ी मुश्किल से एक कैब बुक की। शहर की भागदौड़ और रात का सन्नाटा एक अजीब सा भय पैदा करता है, लेकिन मीना ने खुद को समझाया कि सब ठीक होगा। कैब में बैठते ही उसने फोन मिलाकर माँ को बताया “माँ, मैं कैब में बैठ गई हूँ, बस थोड़ी देर में घर पहुँच जाऊँगी।” माँ ने चैन की साँस ली और कहा ठीक है बेटा, जल्दी आना, खाना तैयार है।” मीना ने हल्की मुस्कान दी लेकिन मन कहीं गहरे डरा हुआ था।
कैब चलते-चलते अचानक रुक गई। ड्राइवर ने कहा मैडम, यहीं तक छोड़ सकता हूँ, आगे से मुझे दूसरी सवारी उठानी है।” मीना थोड़ी झुंझलाई, पर उसने सोचा कि घर तो पास ही है, पैदल चली जाऊँगी। रात का सन्नाटा, सुनसान सड़क और हल्की स्ट्रीट लाइटें एक डर का माहौल बना रही थीं। मीना तेज कदमों से चलने लगी। तभी अचानक पीछे से हंसी की आवाजें आईं। तीन-चार लड़के, जिनके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और शराब की गंध दूर से ही महसूस हो रही थी, उसके सामने आकर खड़े हो गए। मीना के कदम ठिठक गए। उसने हिम्मत बटोरते हुए कहा “आप लोग क्यों मेरा रास्ता रोक रहे हैं? जाने दीजिए प्लीज।” लेकिन उन गुंडों ने उसकी एक न सुनी। उनमें से एक बोला—“अरे भई, आज तो किस्मत मेहरबान है, देखो कौन खुद चलकर हमारे जाल में आ गया।” बाकी सब हंसने लगे और उनके इरादे साफ दिख रहे थे।
मीना का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई लेकिन वहाँ कोई नहीं था। उसने जोर से चिल्लाना शुरू किया—“हेल्प! हेल्प! कोई मेरी मदद करो!” उसकी आवाज सुनसान सड़कों पर गूँजती रही, लेकिन कोई रुका नहीं। जो गाड़ियाँ पास से गुजरीं, उन्होंने सिर घुमा लिया, क्योंकि ऐसे मामलों में शायद ही कोई बीच-बचाव करता है। मीना की आँखों में आँसू आ गए, उसे लगा कि उसकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। तभी अचानक उसे अपने पिता के शब्द याद आए “बेटा, डर से डरना मत। डर हमेशा उतना ही बड़ा होता है जितना हम उसे बना देते हैं। डर से भागोगी तो वो और पीछा करेगा, उसका सामना करोगी तो वो हार जाएगा।” उन शब्दों ने उसके दिल में बिजली सी भर दी। वह कांपते हुए भी अपने भीतर कहीं साहस महसूस करने लगी।
मीना ने अपने बैग की स्ट्रैप कस ली और आँखों में आग भरकर उन लड़कों की तरफ देखा। जब उनमें से एक ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की तो उसने पूरी ताकत से बैग उसके चेहरे पर दे मारा। लड़का लड़खड़ाकर गिर पड़ा। बाकी तीनों एक पल के लिए चौंके, फिर गुस्से से उसकी ओर बढ़े। मीना अब चुप नहीं थी। उसने पास पड़ी एक ईंट उठाई और पूरी ताकत से दूसरे लड़के के कंधे पर दे मारी। वो दर्द से कराह उठा। तीसरा लड़का उसके बाल पकड़ने आया तो मीना ने उसकी गर्दन पर जोरदार कोहनी मारी और उसे धक्का देकर गिरा दिया। उसके भीतर अब वो मासूम लड़की नहीं थी जो डर से काँप रही थी, अब वो चंडी बन चुकी थी। लगभग दस मिनट तक उसने उन चारों से भयंकर लड़ाई लड़ी। वो चीखती रही, मारती रही और आखिरकार खुद को उनके चंगुल से छुड़ा लिया।