रुचि रसोई में चुपचाप बर्तन समेट रही थी। चेहरे पर थकान और आँखों में नमी थी। तभी पीछे से उसकी ननद स्वाति आकर ताने मारते हुए बोली
“वाह भाभी! मायके से तो आप लाखों की बेटी बनकर आई थीं, लेकिन यहाँ तो बस ₹100 की सौगात तक ही सीमित हैं। सच कहूँ तो आपके माता-पिता जैसे लोग दामाद का सम्मान करना जानते ही नहीं।”
ये सुनकर रुचि ने नजरें झुका लीं। कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। लेकिन तभी उसकी सास मालती देवी भी आ गईं और जोड़ते हुए बोलीं —
“हाँ-हाँ, सही कह रही है स्वाति। पिछले हफ्ते तुम्हारे भाई की शादी में गए थे, वहाँ भी क्या सत्कार किया? खाना तो ऐसा था जैसे बस मेहमानों को किसी तरह निपटा रहे हों। हमारे खानदान की तो हंसी उड़ गई होगी वहाँ। और तुम्हारे पिताजी… अरे, दामाद की जेब में सिर्फ 500 रुपये का शगुन रख दिया। शर्म भी नहीं आई उन्हें।”
रुचि की आँखें भर आईं। वह चाहती तो बहुत कुछ कह सकती थी, लेकिन चुप रहना ही बेहतर समझा। इतने में उसका पति अर्जुन भी ऑफिस से लौट आया। घर में प्रवेश करते ही माँ और बहन ने उसकी कान भरनी शुरू कर दी।
“अर्जुन बेटा, देख तो कैसी बहू लाया है तू। मायके से ठीक से संस्कार भी नहीं लाए। अपने मायके की बुराइयाँ हम पर थोप कर रखी हैं।”
अर्जुन ने बिना कुछ पूछे ही माँ और बहन की बातों पर भरोसा कर लिया। वह गुस्से से बोला —
“रुचि! ये सब क्या सुन रहा हूँ मैं? कब सुधरेगी तुम? मायके की इज़्ज़त तुम्हारे लिए सबकुछ है, लेकिन ससुराल का मान-सम्मान तुम्हारे लिए कुछ नहीं? अगर पड़ोस में फिर से हमारी बेइज्ज़ती हुई तो अच्छा नहीं होगा।”
रुचि अब भी शांत रही। मगर उसका मौन अर्जुन को और भड़काने लगा।
“जबाब क्यों नहीं देती? या सचमुच तू मानती है कि तेरे माता-पिता ने मेरा, इस घर का कोई मान नहीं रखा?”
रुचि ने धीरे से कहा —
“अर्जुन, क्या कभी तुमने मुझसे पूछा कि असलियत क्या है? जो बातें माँ और स्वाति दीदी कह रही हैं, उनमें कितनी सच्चाई है? तुमने कभी मेरी बात सुनने की कोशिश की?”
अर्जुन झुंझलाकर बोला —
“तो अब झूठ बोलकर अपने मायके को सही साबित करोगी? मैं जानता हूँ तुम्हारे माता-पिता कितने कंजूस और दिखावटी हैं।”
इतना कहकर वह गुस्से से कमरे की ओर बढ़ा। मगर रुचि वहीं खड़ी रह गई। उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े।