रुचि की आँखें भर आईं। वह चाहती तो बहुत कुछ कह सकती थी, लेकिन चुप रहना ही बेहतर समझा। इतने में उसका पति अर्जुन भी ऑफिस से लौट आया।

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अगले दिन…

सुबह-सुबह मोहल्ले की औरतें घर आईं। मालती देवी चाय परोसते हुए उनके सामने अपनी बहू और उसके मायके की बातें करने लगीं।

“अरे, हम तो ठगे गए इस रिश्ते में। मायके वाले तो बिल्कुल गंवार निकले। दामाद की इज़्ज़त करना तो जानते ही नहीं। ऊपर से हमारी बहू भी उनकी ही तरह निकली।”

ये बातें सुनकर रुचि का कलेजा मुँह को आ गया। वह अंदर कमरे में चली गई। मगर पड़ोस की एक महिला ने कहा —

“मालती जी, बेटी-बेटियों का मजाक उड़ाना ठीक नहीं होता। आखिर वही तो आपकी बहू है। अगर उसका दिल टूट गया तो घर की नींव हिल जाएगी।”

लेकिन मालती देवी और स्वाति को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा।

चरम बिंदु

शाम को अर्जुन लौटा तो उसने फिर वही माहौल देखा। माँ और बहन फिर से रुचि के मायके की बुराई कर रहे थे। अचानक रुचि ने साहस जुटाया। वह सबके सामने आकर बोली —

“बस बहुत हो गया। एक साल से चुप हूँ मैं, लेकिन अब और सहन नहीं होगा। आज सच सबको बताना ही पड़ेगा।”

मालती देवी भड़क उठीं —
“देखा अर्जुन, तेरी बीवी हम पर चीख रही है। यही संस्कार हैं इसके मायके के। माँ-बाप की इज्ज़त करना नहीं सीखा।”

रुचि ने दृढ़ स्वर में कहा —
“संस्कार की बात आप कर रही हैं मम्मी जी? तो सुन लीजिए। जिस दिन मेरे पापा ने आपको शगुन में ₹500 दिए थे, उस दिन उनके पास इससे ज्यादा नहीं था। क्योंकि उसी सुबह उन्होंने अपनी बीमारी की दवा और छोटे भाई की फीस जमा की थी। फिर भी उन्होंने दामाद की इज़्ज़त रखी। आप चाहती थीं कि वो दिखावा करें, लेकिन उन्होंने सच्चाई चुनी।

और आपने कहा कि मेरी मम्मी ने दामाद से दवाई मंगवाई। तो हाँ, मंगवाई थी। क्योंकि उस दिन घर में कोई और नहीं था और वो खुद बुखार से तप रही थीं। उन्होंने पैसे भी देने चाहे थे, लेकिन अर्जुन ने ही ‘रहने दीजिए’ कहकर मना कर दिया। तो इसमें मम्मी की गलती कहाँ है?”

रुचि के शब्द तीर की तरह चुभ रहे थे। अर्जुन चुप खड़ा था।

रुचि ने आगे कहा —
“और ये बात पड़ोसियों में फैलाना… क्या यही संस्कार हैं आपके? अगर बहू मायके के लिए एक शब्द बोले तो अपराध, लेकिन सास और ननद दिन-रात मायके की बुराई करें तो वो ठीक? नहीं मम्मी जी, सम्मान एकतरफा नहीं होता। सम्मान चाहिए तो देना भी पड़ता है।”

स्वाति तमतमाते हुए बोली —
“वाह! भाभी, कितनी तेज जुबान है आपकी। पति से भी उलझ रही हैं।”

रुचि ने पलटकर कहा —
“हाँ, उलझ रही हूँ। क्योंकि अब चुप रहने से और गलत बातें फैलेंगी। और अर्जुन… तुम! पति हो मेरे, लेकिन हर बार बिना सुने माँ और बहन का साथ देते हो। क्या तुम्हें याद है कितनी बार मैंने कहा था कि छोटी-छोटी बातें मायके की मत बताया करो? लेकिन तुमने हर बात जाकर बता दी। नतीजा ये हुआ कि मेरा मायका आज पूरे मोहल्ले में हंसी का पात्र बन चुका है।

तुम्हारे लिए शर्म की बात है कि अपनी पत्नी की इज़्ज़त बचाने के बजाय तुम ही उसके दिल को तोड़ते आए हो।”

रुचि की आँखों से आँसू बह रहे थे, मगर आवाज़ मज़बूत थी।

अर्जुन स्तब्ध रह गया। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने माँ और बहन की तरफ देखा। मालती देवी और स्वाति दोनों गुस्से में तिलमिला रही थीं।

“मम्मी, दीदी… अब बस। बहुत हो गया। अगर आज रुचि ने आवाज़ उठाई है, तो उसमें हमारी भी गलती है। मैंने ही उसकी हर बात बताकर ये माहौल बनाया। और आप लोगों ने उसे ताने बनाकर मोहल्ले में हंसी बना दिया। आगे से मैं खुद भी और आप लोग भी, रुचि के मायके का मजाक नहीं उड़ाएँगे। ये मेरा वादा है।”

ये कहते हुए अर्जुन ने रुचि का हाथ थाम लिया।

Ankit Verma

अंकित वर्मा एक रचनात्मक और जिज्ञासु कंटेंट क्रिएटर हैं। पिछले 3 वर्षों से वे डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं और Tophub.in पर बतौर लेखक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। लाइफस्टाइल, टेक और एंटरटेनमेंट जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते हैं।

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