संध्या की आँखें अब स्थिर हो गईं।
“माफी? और मैं क्यों माँगूँ माफी? सच कहा था मैंने। जब पड़ोस की औरतों के सामने आपकी माँ और बहन मेरे माता-पिता के बारे में बेहूदा बातें कर रही थीं, तब आपने क्यों नहीं रोका? या आपको वही सुनना अच्छा लगता है?”
वरुण का गुस्सा और भड़क गया।
“बस! ज़्यादा ज़ुबान मत चलाओ। पड़ोसियों के सामने हमें बदनाम किया है तुमने। अब चुपचाप माफी माँगो।”
तभी गीता जी आगे बढ़ीं। हाथ जोड़े, मानो भगवान को गवाही दे रही हों।
“हे राम! देखो तो ज़रा, कैसी ज़ुबान लड़ाती है ये! यही संस्कार मिले हैं इसे अपने माँ-बाप से? बहुएँ तो वो होती हैं जो ससुराल की बातों को छुपा लें, पर ये तो शान से पड़ोस में जाकर बता रही थी कि इसके ससुराल वालों ने इसके माता-पिता को ठंडी रोटी खिलाई, और सिर्फ सौ रुपये का शगुन दिया। अरे, हमारे भाई को कंजूस कहने से पहले दस बार तो सोचती।”
संध्या का दिल छलनी हो गया।
“क्या गलत कहा मैंने? सच ही तो कहा था। अगर आपने मेरे माता-पिता को ताने दिए, तो मुझे भी हक है सच कहने का। वरना, चुप रहने का मतलब ये नहीं कि मेरे मायके की इज़्ज़त कोई रौंदे।”
प्रेरणा भी बीच में कूद पड़ी।
“सच ही तो कहा था हमने! तुम्हारे माता-पिता ने अपने दामाद की इज़्ज़त तक नहीं की। गँवारों जैसा व्यवहार किया। अब सच सुनकर तुम्हें मिर्ची लग रही है तो हम क्या करें?”
वरुण ने ऊँची आवाज़ में संध्या को डाँटा—
“बस! बहुत हो गया। बहू होकर ससुराल वालों का अपमान करती हो। अब अगर माफी नहीं माँगी तो…”
संध्या ने उसकी बात बीच में काट दी।
“वरना क्या कर लोगे? हाथ उठाओगे?”
वरुण ने सचमुच गुस्से में हाथ उठाने की कोशिश की, लेकिन संध्या ने उसकी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि वरुण चौंक गया।
संध्या की आवाज़ अब काँप नहीं रही थी, उसमें दृढ़ता थी।
“बस करो वरुण। मुझ पर हाथ उठाने की कोशिश की तो मेरा हाथ भी उठेगा। और याद रखना, जिस दिन औरत जवाब देती है, उस दिन उसका सब्र टूट चुका होता है।”
गीता जी और प्रेरणा ने अपने कानों पर हाथ रख लिया।
“हे भगवान! ये कलयुग आ गया। बहू अपने पति पर हाथ उठाने की बात कर रही है।”