शाम का समय था। कस्बे की पुरानी किताबों और खिलौनों की दुकान पर मैं यूँ ही घूम रहा था। कोने में बच्चों के खिलौनों का छोटा-सा सेक्शन था। रंग-बिरंगे गुड्डे, गाड़ियाँ, गेंदें और लकड़ी के पज़ल रखे हुए थे। तभी मेरी नज़र एक छोटे से लड़के पर पड़ी। उसकी उम्र मुश्किल से आठ साल होगी। नन्हें-से हाथों में उसने एक गुड़िया कसकर पकड़ी हुई थी।
उसके कपड़े साधारण थे, पैर में पुराने से चप्पल। आँखों में चमक थी पर चेहरे पर एक गहरी थकान भी। वह बार-बार गुड़िया को पलटकर देख रहा था और फिर अपनी छोटी जेब से सिक्के निकालकर गिनने लगता। दुकानदार उसके पास आया और नरम आवाज़ में बोला,
“बेटा, तुम्हारे पास जितने पैसे हैं, उनसे यह गुड़िया नहीं मिल सकती।”
लड़के ने सिर झुका लिया। कुछ पल खामोश रहा और फिर धीरे से मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में एक सवाल था। मैंने मुस्कुराकर कहा,
“बोलो बेटा, किसके लिए चाहिए यह गुड़िया?”
वह रुक-रुककर बोला,
“ये गुड़िया मेरी छोटी बहन के लिए है। वो हमेशा कहती थी कि जब मैं बड़ा हो जाऊँगा तो उसे सबसे सुंदर गुड़िया लाकर दूँगा। पर… अब वो मुझसे कभी नहीं माँगेगी।”
मैं चौंक पड़ा। “क्यों बेटा, कहाँ है तुम्हारी बहन?”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“वो अब अस्पताल से कभी घर नहीं आएगी। पापा कहते हैं कि भगवान ने उसे अपने पास बुला लिया। मम्मी रोज़ रोती हैं और कहते हैं कि अगर गुड़िया होती तो बहन खुश हो जाती। मैं चाहता हूँ कि जब मम्मी उसकी फोटो के पास दीपक जलाएँ तो यह गुड़िया भी वहीं रख दें। ताकि बहन को लगे कि उसका भाई वादा निभा गया।”
मेरे गले में शब्द अटक गए।
मैंने सिक्के गिने, सचमुच पैसे कम थे। मैंने धीरे से कुछ नोट उसमें मिला दिए और फिर से गिनकर दुकानदार को पकड़ा दिया। दुकानदार समझ गया और मुस्कुराकर गुड़िया पैक कर दी।
लड़के के चेहरे पर ऐसी खुशी झलकी मानो उसने दुनिया जीत ली हो। उसने गुड़िया को सीने से लगाकर कहा,
“धन्यवाद अंकल! अब मेरी बहन अकेली नहीं रहेगी।”