दो दिन बाद सुबह का अख़बार खोला तो दिल दहल गया। एक सड़क हादसे की खबर थी। लिखा था कि एक बस ड्राइवर ने रात में शराब पी रखी थी और मोबाइल पर बात करते-करते उसने तेज़ रफ्तार से एक कार को टक्कर मार दी। उस कार में एक दंपति और उनका छोटा बच्चा था। बच्चा मौके पर ही दम तोड़ गया और माँ गहरी कोमा में चली गई।
मुझे अचानक वह नन्हा लड़का याद आया। कहीं ये वही तो नहीं…
कुछ दिनों बाद एक रिश्तेदार के कहने पर मैं शहर के बड़े अस्पताल गया। वहीं देखा—वह लड़का गेट के बाहर बैठा था। उसके हाथ में वही गुड़िया थी। आँखें लाल थीं। मैंने उसके पास जाकर धीरे से पूछा,
“बेटा, यहाँ क्यों बैठे हो?”
वह बोला,
“मम्मी अब अस्पताल से घर नहीं जाएँगी अंकल। डॉक्टर अंकल ने कहा है कि अब बस भगवान के पास जाना है। पापा कहते हैं कि जब मम्मी वहाँ जाएँगी तो उन्हें यह गुड़िया ज़रूर देना, ताकि बहन अकेली न रहे। मैं इंतज़ार कर रहा हूँ।”
उसकी मासूमियत ने मेरी रूह हिला दी।
कुछ दिनों बाद, अख़बार में फिर वही परिवार की खबर थी। लिखा था कि महिला भी अब इस दुनिया में नहीं रहीं।
मैं खुद को रोक नहीं पाया और अंतिम संस्कार में चला गया। वहाँ दृश्य देखकर मेरे पाँव काँप गए। सफेद चादर में लिपटी महिला के सीने पर एक गुड़िया रखी थी। वही गुड़िया, जो उस छोटे बच्चे ने सीने से लगाकर खरीदी थी। उसके बगल में उनकी छोटी बच्ची की तस्वीर और कुछ सफेद फूल रखे थे।
लड़का एक कोने में खड़ा था। आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन उसने मजबूती से कहा,
“अब मेरी बहन अकेली नहीं रहेगी। मम्मी उसे गोद में लेकर यह गुड़िया दिखाएँगी।”
उसकी बात सुनकर वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें भर आईं।
मैं घर लौटा तो नींद नहीं आई। दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था—
क्या इस सबका कसूर उस मासूम का था?
नहीं, कसूर था उस ड्राइवर का, जिसने शराब और मोबाइल को स्टीयरिंग से ज़्यादा ज़रूरी समझा।