जब वह देर रात थकी-हारी लौटी, तो दरवाज़ा खुला पड़ा था। घर अस्त-व्यस्त था। खिलौने इधर-उधर बिखरे थे। पाँचों स्कूल बैग जमीन पर पड़े थे। पर बच्चे… बच्चे कहीं नहीं थे।
उसके हाथों से थैली गिर गई। दिल जोर से धड़कने लगा।
“मनीष! मानव! मीरा! माया! मोहिनी!”
उसकी चीखें तंग गलियों में गूँज उठीं।
वह पड़ोसियों के पास भागी। एक औरत ने धीरे से कहा –
“सुना है, बच्चों को कोई कार में बिठा कर ले गया।”
आशा के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसके दिमाग में ढेरों शक उठे – कहीं उनका अमीर पिता तो नहीं? या फिर बच्चों का कोई दुश्मन?
उसने पूरी रात गलियों में ढूँढा। स्टेशन तक दौड़ी, मंदिर तक गई, हर चौक-चौराहे पर बच्चों के नाम पुकारे। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।
सुबह हुई तो उसकी आँखों में नींद नहीं थी, बस सूजन और लालपन था। पेट खाली था, दिल टूटा हुआ था।
उसकी दुनिया, उसकी साँसें, उसका जीने का मक़सद – सब गायब हो गए थे।
और वहीं, उसी सुबह, एक औरत का दिल टूटा हुआ शहर की भीड़ में गुम हो गया।
अब सवाल ये था – क्या सचमुच बच्चों को उनका पिता ले गया? या फिर किसी और ने उसकी जिंदगी से उसका सबकुछ छीन लिया?
आशा के जीवन की इस अँधेरी गली में सिर्फ सवाल थे… जवाब कहीं नहीं। Emotional story in hindi