मनीष गुस्से से चिल्लाया –
“मुझे इस घर से नफ़रत है! हमारे पापा कहाँ हैं? तुम कभी उनके बारे में क्यों नहीं बतातीं?”
आशा का दिल काँप गया। उसने दस सालों से सच छिपा रखा था। बच्चों को कभी पिता का नाम नहीं बताया। उसने बस धीरे से कहा –
“तुम्हारे पापा… अब इस दुनिया में नहीं हैं।”
लेकिन मनीष को यकीन नहीं हुआ। उसने पुरानी अलमारी में से तस्वीर निकाल ली। उस आदमी की – जिसके पास सब कुछ था।
“ये हमारे पापा हैं ना? वो तो ज़िंदा हैं। तुमने हमें क्यों धोखा दिया? क्यों नहीं ढूँढा उन्हें?”
बच्चे रोने लगे, एक-दूसरे पर दोष देने लगे। बर्तन टूटे, आवाज़ें गूँज उठीं। आशा ने सबको अपनी बाहों में भर लिया और बस इतना कह पाई –
“बच्चो, माफ करना… माँ से गलती हो गई। पर यकीन करो, मैं तुमसे अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करती हूँ।”
उस रात बच्चे देर तक रूठे रहे। आशा चुपचाप बैठी रही, आँसू पोंछती रही।
अगली सुबह वह जल्दी उठी। हर बच्चे के माथे को चूमा और बाहर चली गई कबाड़ इकट्ठा करने। जाते-जाते उसने वादा किया –
“शाम को आऊँगी तो तुम सबके लिए कुल्फी लाऊँगी।”
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।