मुंबई की तंग गलियों में, लोहे की चादरों से ढके छोटे-से घर में आशा नाम की औरत रहती थी। उम्र तीस के आस-पास होगी, चेहरा मेहनत से झुलसा हुआ और हाथों में हर वक्त खुरदुरापन। उसकी दुनिया सिर्फ और सिर्फ उसके पाँच बच्चे थे – मनीष, मानव, मीरा, माया और मोहिनी। पाँचों एक ही साल में पैदा हुए थे, जैसे भाग्य ने उसे पाँच गुना जिम्मेदारियाँ एक साथ सौंप दी हों।
आशा का पति नहीं था। सच तो यह था कि जिसने उसे धोखा दिया था, वह बहुत बड़ा आदमी था – पैसा, इज़्ज़त, शोहरत सब कुछ था उसके पास। लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि आशा माँ बनने वाली है, उसने मुँह मोड़ लिया। आशा को ज़िंदगी भर के लिए अकेला छोड़ दिया। कुछ औरतें टूट जातीं, पर आशा ने अपने आँसुओं को चुपचाप पोंछा और ठान लिया – चाहे जो हो, वह इन बच्चों को पालकर दिखाएगी।
लेकिन अकेली औरत के लिए मुंबई में ज़िंदगी जीना आसान कहाँ था? आशा सुबह से रात तक कूड़ा बीनती, बोतलें और कबाड़ इकट्ठा करती, और उसी से थोड़ा-बहुत पैसा मिलता। खाने के लिए अक्सर सिर्फ पतली दाल और बासी चावल ही होते। बरसात में छत से पानी टपकता, गर्मी में टीन का घर भट्टी की तरह तपता। फिर भी वह मुस्कुराती थी। उसे लगता था कि अगर उसके बच्चे पढ़-लिख लें तो सारी मेहनत सार्थक होगी।
लेकिन बच्चे बड़े होने लगे। अब उन्हें एहसास होने लगा कि उनकी माँ का काम समाज की नज़र में छोटा है।
मनीष, सबसे बड़ा बेटा, अक्सर गुस्से में कहता –
“माँ, तुम हर वक्त कूड़ा क्यों बीनती हो? मेरे दोस्त हँसते हैं। उनके माँ-बाप ऑफिस जाते हैं, गाड़ी में बैठते हैं। मुझे शर्म आती है तुम्हें देखकर।”
मानव, स्वभाव से झगड़ालू था। छोटी-सी बात पर भी भड़क जाता।
मीरा और माया अपनी सहेलियों के तानों से रोती रहतीं – “कबाड़ीवाले की बेटी, कबाड़ीवाले की बेटी…”
और सबसे छोटी मोहिनी, चुपचाप माँ के पीछे छिप जाती। उसकी आँखों में सवाल होते, लेकिन होंठ कभी खुलते नहीं।
आशा चुपचाप सब सुनती, दिल में दर्द होता लेकिन चेहरे पर मुस्कान बनाए रखती।
वह सोचती – “इनके लिए ही तो सह रही हूँ। एक दिन ये समझेंगे कि माँ क्यों झुकती है, क्यों खून-पसीना एक करती है।”
एक बरसाती शाम की बात है। आशा देर से लौटी। हाथ में कुछ सस्ती रोटियाँ थीं। घर पहुँची तो देखा, पाँचों बच्चे आपस में जोर-जोर से झगड़ रहे थे।