मंगला ने चाय के कप धोते हुए धीमे स्वर में अपने पति से कहा “मैं ज़रा दो घड़ी कल्याणी के पास जाने की सोच रही हूँ। चाय पीनी हो तो बना दूँ?” हीरालाल अख़बार में नज़र गड़ाए बैठे थे। उन्होंने बिना ऊपर देखे ही उत्तर दिया “अभी तो चाय की इच्छा नहीं। बहुएँ तो घर में ही हैं ना? पीनी होगी तो कह दूँगा किसी को बना देने को। तुम जाओ, कब तक आओगी?” मंगला हल्की झुंझलाहट में बोली “आऊँगी तो तब ना जब निकलूँगी यहाँ से। चाय तो क्या मिलेगी तुम्हें, आज तो लगता है कि रोटी भी मुझे ही बनानी पड़ेगी। दोनों बहुएँ मुँह फुलाए बैठी हैं। ऐसा करो, तुम भी मेरे साथ चले चलो। मुझे भी तुम्हारी चाय की चिंता ना रहेगी।” पत्नी की बात सुनकर हीरालाल का चेहरा उतर गया। वह बोले—“ये तो हर तीसरे दिन का काम हो गया है। साहबज़ादों को कुछ कहो तो उल्टा हमें ही सुनना पड़ता है कि उन्होंने कौन सी अपनी मर्ज़ी से शादी की थी, जैसी बहुएँ लाए, हम ही लाए।” मंगला ने ताना मारते हुए कहा “यही तो मरना हो गया जी! अच्छा चलो, उठो। दो घड़ी कल्याणी के चलते हैं, थोड़ा मन भी बदल जाएगा।”
मंगला के ज़ोर देने पर हीरालाल उठ खड़े हुए। दोनों साथ कल्याणी के घर पहुँचे। कल्याणी ने दरवाज़ा खोला तो मंगला को देख ख़ुशी से चिल्ला उठी “अरे आज तो पक्का बारिश आएगी, ये जोड़ा हमें याद करने कैसे आ गया! रघु के पापा, ज़रा बाहर आइए, भाईसाहब भी आए हैं।” कल्याणी के पति बाहर आए और दुआ-सलाम हुई। उधर कल्याणी और मंगला अंदर चली गईं। जाते-जाते कल्याणी ने अपनी बहुओं को आवाज़ दी “शिवानी, अंजलि… देखो तुम्हारे मौसा-मौसी आए हैं। चाय बनाओ।” तुरंत दोनों बहुएँ बाहर आईं, उन्होंने मंगला और हीरालाल के पैर छुए, आशीर्वाद लिया और विनम्रता से बातें कीं। मंगला हर बार सोचती काश! उसकी बहुएँ भी ऐसी होतीं, जो आदर और प्रेम से व्यवहार करतीं।