कमरे में बैठते ही मंगला ने कहा “कल्याणी, आज सुबह से ही मन कर रहा था तुझसे मिलने का। तुझे तो कभी समय ही नहीं मिलता।” कल्याणी मुस्कुराई “हाँ भई, मानती हूँ गलती अपनी। कई बार सोचती हूँ तेरे पास आऊँ, पर घर-परिवार का चक्कर ही ऐसा है। बच्चों के स्कूल, पति की दौड़भाग, बहुओं के काम—दिन कब निकल जाता है पता ही नहीं चलता।” इतने में उसकी बहू शिवानी आई और बोली—“मम्मी, नोएडा जाने की ज़रूरत नहीं है। यहाँ भी अच्छे स्कूल हैं। परिवार से दूर रहने पर बच्चों का लगाव भी कम हो जाएगा।” अंजलि ने भी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा—“हाँ मम्मी, मयंक भैया हर हफ़्ते आते ही हैं। मेरठ से नोएडा कोई बहुत दूर भी तो नहीं।” बहुओं की बातें सुनते ही मंगला ने गौर किया कि कल्याणी के चेहरे पर संतोष और चमक थी।
मंगला ने उत्सुकता से पूछा “क्या कभी इनमें किसी बात को लेकर मतभेद नहीं होता?” कल्याणी हँसकर बोली “अरे क्यों नहीं होता! जहाँ दो बर्तन हों, खटकना तो स्वाभाविक है। पर मेरी बहुएँ फिर भी बहनों की तरह रहती हैं। कभी खटर-पटर हो भी जाए तो मैं ध्यान रखती हूँ कि बात वहीं खत्म हो जाए। समझाना पड़ता है, पर गुस्सा ज़्यादा देर तक नहीं पालती। छोटी-सी कहासुनी को लंबा नहीं खींचना चाहिए।”
कल्याणी की बातें सुनते-सुनते मंगला के दिल में गहरा पश्चाताप उठने लगा। सुबह ही तो उसकी बहुओं में झगड़ा हुआ था। बड़ी बहू सुनंदा कई दिनों से कमरदर्द से जूझ रही थी। छोटी बहू नीना अपनी भाभी की मंगनी में जाना चाहती थी। उसने बड़ी बहू से कहा था “दीदी, मैं सब्ज़ियाँ बना देती हूँ, पुलाव भी तैयार कर देती हूँ। बस आप मम्मी-पापा के लिए दो-दो रोटियाँ बना देना।” पर मंगला को यह मंज़ूर नहीं था। उसने बड़ी बहू का पक्ष लेते हुए नीना से कहा “तुझे मंगनी में जाने की पड़ी है? जेठानी का दर्द नहीं दिखता?” यह सुनकर नीना भी भड़क गई “मम्मी जी, आप इनकी कब से सगी हो गईं? कल तो आप ही कह रही थीं कि ये नाटक कर रही है। और चार रोटियाँ आप भी बना सकती हैं।”
मंगला अब सोच रही थी कि चार रोटियों की छोटी-सी बात को उसने खुद ही बड़ा बना दिया था। अगर वह थोड़ी समझदारी दिखाती तो घर में तनाव न होता। कल्याणी ने ठीक ही कहा था रिश्ते निभाने के लिए गुस्से से ज़्यादा अपनापन ज़रूरी है। चाय पीकर जब वह घर लौटी तो सीधे नीना से बोली “बेटा, तूने अभी तक मंगनी में जाने की तैयारी नहीं की?” नीना उदास आवाज़ में बोली “आप जाने देतीं तो तैयारी करती ना।” मंगला ने गहरी साँस लेते हुए कहा “अरे बेटा, छोटी-मोटी कहासुनी होती रहती है। तू जा, तैयारी कर ले। वैभव को मत ले जाना, मैं रख लूँगी। देर हो जाएगी तो बच्चा दुखी हो जाएगा। और सुन, सुनंदा के कमरदर्द की चिंता मत कर, चार रोटियाँ मैं बना लूँगी।” नीना चौंक गई। बोली “नहीं-नहीं मम्मी जी, इतनी देर क्या फ़र्क पड़ता है। मैं सेंक दूँगी।”
मंगला की आँखें नम हो गईं। आज पहली बार उसने महसूस किया कि असली जीने की कला यही है रिश्तों को समझना, सहेजना और छोटी बातों को बड़ा न बनने देना। देर से सही, मगर उसने सीख लिया था कि घर की शांति अपने शब्दों और व्यवहार पर निर्भर करती है।