छह-सात दिन ऐसे ही निकल गए। न कमलेश ने दोबारा शादी का मुद्दा उठाया, न शकुंतला ने। दोनों जानते थे कि रिश्ता भरोसे पर टिका है, दबाव डालने से कुछ हासिल नहीं होगा।
फिर रविवार का ही दिन था। शकुंतला ने खुद ही यह विषय छेड़ा। उसने धीरे से कहा –
“कमलेश, मैंने तुम्हारी बात पर बहुत सोचा। पर मुझे लगता है, हमें वैसे ही रहना चाहिए जैसे अब तक रह रहे हैं। शादी का सर्टिफिकेट आखिरकार एक कागज़ का टुकड़ा ही है। बिना उस कागज़ के भी हम आदर्श जोड़े की तरह जी रहे हैं। मेरे ख्याल से शादी की ज़रूरत नहीं है।”
कमलेश ने गहरी साँस ली।
“मैंने तो सिर्फ इसलिए कहा था ताकि भविष्य में तुम्हें कानूनी दिक़्क़तें न हों। मान लो मेरी मौत के बाद रिश्तेदार इस घर पर दावा करें तो तुम्हें परेशानी होगी।”
शकुंतला मुस्कुराई –
“उसका हल भी है। हम दोनों एक-दूसरे के नाम वसीयत बना देंगे। किसी को भी बीच में दखल देने का मौका ही नहीं मिलेगा। शादी की रस्में निभाने की कोई ज़रूरत नहीं। बस एक वादा करो कि जैसे अब तक साथ रहे हैं, वैसे ही आगे भी रहेंगे।”
कमलेश ने उसकी आँखों में झाँककर देखा और हल्की मुस्कान के साथ कहा –
“चलो, ये भी ठीक है। आखिर रिश्ता कागज़ पर नहीं, दिल में होना चाहिए।”Hindi Love Stories