उसके बाद कई दिन शकुंतला इस सोच में डूबी रही। अतीत आँखों के सामने घूम गया। पहली बार कमलेश से उसकी मुलाक़ात काम के सिलसिले में हुई थी। दोनों अलग-अलग कंपनियों में काम करते थे, पर आपसी लेन-देन के कारण अक्सर आमना-सामना हो जाता। पहले दोस्ती, फिर नज़दीकियाँ।
शकुंतला की ज़िंदगी आसान नहीं थी। बचपन में ही उसकी शादी हो गई थी, लेकिन पति से मिलने से पहले ही वो विधवा हो गई। विधवा विवाह तब समाज की नज़र में गुनाह जैसा था। दूसरी तरफ़, कमलेश कभी शादी के बंधन में बंधना चाहता ही नहीं था। रिश्ते आते-आते बंद हो गए और वो भी अकेला रह गया।
धीरे-धीरे दोनों का अकेलापन एक-दूसरे का सहारा बन गया। जब शकुंतला के मकान मालिक ने उसका किराए का घर बेचने का फैसला किया तो कमलेश ने ही उसे अपने फ्लैट में आकर रहने को कहा। शुरू में थोड़ी झिझक हुई, पर कमलेश की ईमानदारी और भरोसे ने शकुंतला का दिल जीत लिया।
एक ही घर में रहते-रहते दोनों पति-पत्नी जैसे हो गए। मोहल्ले वाले भी उन्हें शादीशुदा समझने लगे। और सच कहें तो शादी के बिना भी उनके रिश्ते में वैसा ही अपनापन था जैसा किसी भी अच्छे दंपत्ति में होता है।
अब, बीस साल बाद, जब कमलेश ने शादी का जिक्र छेड़ा तो शकुंतला का मन उलझ गया। सोचती – क्या शादी के बाद भी उनका रिश्ता ऐसा ही सहज रहेगा? या फिर नए नियम और औपचारिकताएँ बीच में आ जाएँगी? उसका एक मन कहता – जब सब सही है तो क्यों बदलें? दूसरा मन कहता – कमलेश ने हमेशा उसका भला ही सोचा है, तो शायद इस बार भी वही सही सोच रहा हो।