घर की दीवारें, बड़े-बड़े कमरे, महंगे फर्नीचर, सब कुछ था इस घर में पर फिर भी आज घर सुनसान लग रहा था।

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वो रात बहुत भारी थी। दोनों खामोशी में डूबे रहे। घर के हर कोने से जैसे सवाल उठ रहे थे—
“अब इस दौलत का क्या करोगे? अब इस बड़े घर में किसके लिए जियोगे?”

दिन बीतने लगे। घर में कभी-कभार नौकर-चाकर आते, काम निपटाकर चले जाते। कीर्ति कभी फोन कर लेती, कुणाल और सुरभि भी हफ्ते में एक-दो बार वीडियो कॉल कर लेते। लेकिन वो बात कहाँ थी? मोबाइल स्क्रीन की मुस्कान असली हँसी से कितनी दूर होती है, ये रमा जी हर दिन महसूस करतीं।

कभी-कभी रमा कहतीं—
“सुशांत, याद है? जब कुणाल छोटा था तो तुम्हें क्रिकेट खिलाने बुलाता था। तुमने कहा था—‘बेटा, अभी काम है। कल खेलेंगे।’ और वो कल कभी आया ही नहीं।”
सुशांत जी बस चुप रह जाते।

समय चलता रहा। दोनों बूढ़े होते गए। बच्चे अपनी-अपनी दुनिया में मशगूल। घर की दीवारें, जिन पर कभी बच्चों की हँसी गूँजती थी, अब बस खामोशी समेटे थीं।

एक दिन शाम को सुशांत जी बरामदे में बैठे थे। सामने बगीचे में झूला खाली पड़ा था। अचानक उनकी आँखों से आँसू टपक पड़े। उन्होंने सोचा—
“कितना गलत कर दिया मैंने। ज़िंदगी भर समझता रहा कि दौलत ही सब कुछ है। पर असली दौलत तो बच्चे थे, उनका बचपन था… जो मैंने खो दिया।”

रमा पास आईं। उन्होंने धीरे से कहा—
“अब पछताने से क्या होगा, सुशांत? जो बीत गया, वो लौटकर नहीं आएगा।”

लेकिन उस दिन सुशांत जी ने ठान लिया। अगले ही हफ़्ते उन्होंने अपने कारोबार का बड़ा हिस्सा बेच दिया। पैसा अब उन्हें बोझ जैसा लगने लगा था। वो चाहते थे कि अब बाकी ज़िंदगी इंसानियत और रिश्तों में गुज़ारें।

उन्होंने एक अनाथालय को दान देना शुरू किया। छोटे-छोटे बच्चों के साथ समय बिताने लगे। रमा भी उनके साथ जातीं। धीरे-धीरे वो खालीपन कुछ कम होने लगा। जब बच्चे ‘दादा-दादी’ कहकर गले लगते, तो दोनों की आँखों में चमक लौट आती।

कभी-कभी कुणाल और सुरभि भी वीडियो कॉल पर देखते और चकित रह जाते।
“पापा, आप तो बदल गए हैं। पहले तो आपको काम से फुर्सत ही नहीं मिलती थी।”

सुशांत जी मुस्कुराते और कहते—
“बेटा, अब समझ आया है… काम ज़रूरी है, लेकिन परिवार उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।”

रमा मन ही मन सोचतीं—
“काश, ये समझ पहले आ जाती। तब शायद हमारा घर आज भी बच्चों की हँसी से गूंज रहा होता।”

लेकिन फिर वो खुद को समझा लेतीं।
“चलो देर से ही सही, अब तो सही रास्ता मिल गया।”

और इस तरह उनकी ज़िंदगी का आख़िरी पड़ाव बीतने लगा। बच्चों की कमी हमेशा खलती रही, पर अनजान बच्चों की मुस्कान ने उस दर्द को थोड़ा हल्का कर दिया।

सुशांत जी अब हर किसी से यही कहते—
“कमाई ज़रूरी है, मगर अपने बच्चों को वक्त देना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। वरना एक दिन दौलत तो होगी, लेकिन घर खाली रह जाएगा।”

Ankit Verma

अंकित वर्मा एक रचनात्मक और जिज्ञासु कंटेंट क्रिएटर हैं। पिछले 3 वर्षों से वे डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं और Tophub.in पर बतौर लेखक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। लाइफस्टाइल, टेक और एंटरटेनमेंट जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते हैं।

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