रमा उस वक़्त चुप हो जातीं, पर मन ही मन सोचतीं—
“दौलत तो फिर भी आ जाएगी, पर बच्चों का बचपन एक बार चला गया तो वापस नहीं आएगा।”
साल गुज़रते गए। कीर्ति बड़ी हुई, पढ़ाई में होशियार निकली, लॉ की डिग्री ली और तीन साल पहले शादी हो गई। अब वो अपने ससुराल में खुश थी।
कुणाल पढ़ाई में और भी तेज़ था। एमबीए करने के बाद एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिली। वहीं सुरभि से मुलाकात हुई, दोनों को प्यार हुआ और शादी कर ली।
शादी के बाद कुछ दिनों तक घर में फिर से रौनक लौटी थी। बहू के आने से रमा जी की दुनिया जैसे खिल उठी थी। कुणाल शाम को ऑफिस से लौटकर माँ के साथ बैठता, बातें करता, और कभी-कभी पापा से भी पूछ लेता—
“पापा, आप बहुत थक जाते हो न? अब थोड़ा आराम कर लो।”
पर फिर अचानक सब बदल गया। कंपनी ने कुणाल को विदेश पोस्टिंग का ऑफर दिया। करियर का सुनहरा मौका था। कुणाल ने बिना देर किए हाँ कर दी।
रमा जी ने रोकने की कोशिश की, पर कौन रुकता है आजकल? बेटे-बहू दोनों ने कहा—
“बस कुछ साल के लिए जा रहे हैं। फिर लौट आएँगे।”
और आज वही दिन आ गया था।
रमा जी खाली कमरे में घूमती रहीं। बेटे का कमरा, बहू की अलमारी, सब जैसे कल तक ज़िंदा थे और आज वीरान। उन्होंने एक तस्वीर उठाई जिसमें पूरा परिवार मुस्कुराता दिख रहा था। देखते-देखते उनकी आँखें भर आईं।
सुशांत जी पास आकर बोले—
“रो मत रमा, बच्चों का भला हो रहा है। यही तो चाहते थे हम।”
रमा फट पड़ीं—
“हम? सच कहो सुशांत, तुम चाहते थे। तुमने हमेशा पैसों को बच्चों से ऊपर रखा। कहते रहे कि सब बच्चों के लिए कर रहे हो। आज देख लो… बच्चे चले गए, और हम रह गए अकेले। यही चाहते थे न?”
सुशांत जी चुप हो गए। उनके पास कोई जवाब नहीं था। सच यही था। उन्होंने ज़िंदगी भर सोचा था कि बच्चों को सब सुख-सुविधा दें। लेकिन कभी ये नहीं सोचा कि बच्चों को समय भी चाहिए। प्यार भी चाहिए।