सुशांत जी और रमा जी घर लौटे तो दरवाज़ा खोलते ही जैसे एक अजीब सी खामोशी ने उनका स्वागत किया। सुबह-सुबह एयरपोर्ट पर बेटे कुणाल और बहू सुरभि को विदेश के लिए विदा करके आए थे। एयरपोर्ट से लौटते वक़्त रमा की आँखें बार-बार नम हो रही थीं। सुशांत जी ने देखा भी, मगर कुछ कहा नहीं। वो वैसे भी कम बोलने वाले इंसान थे।
घर की दीवारें, बड़े-बड़े कमरे, महंगे फर्नीचर, सब कुछ था इस घर में… पर फिर भी आज घर सुनसान लग रहा था। जैसे कोई आत्मा बस गई हो इसमें।
रमा धीरे से बोलीं—
“सुशांत, देखा न… बच्चे चले गए। ये घर कितना खाली लग रहा है। इतना बड़ा मकान, इतने कमरे… मगर अब किसके लिए?”
सुशांत जी ने बस सिर हिला दिया। उनकी आँखें भीगी नहीं थीं, पर अंदर कहीं गहरे एक टीस उठ रही थी। वो आदमी जिसने ज़िंदगी का हर पल दौलत कमाने में झोंक दिया, आज अपने ही घर में अकेला महसूस कर रहा था।
उन्हें याद आने लगा जब बच्चे छोटे थे। कीर्ति और कुणाल अक्सर इंतज़ार करते रहते कि पापा कब घर आएँगे। स्कूल से आते तो माँ को कहते—
“मम्मी, पापा कब आएँगे? आज मैं उन्हें ड्रॉइंग दिखाऊँगा।”
“पापा आएँगे तो क्रिकेट खेलेंगे।”
लेकिन ज़्यादातर दिन सुशांत जी देर रात तक ऑफिस या दुकान में बिज़ी रहते। जब तक घर लौटते, बच्चे सो चुके होते। कई बार रमा जी कहतीं—
“थोड़ा वक्त बच्चों को भी दे दो, ये दिन लौटकर नहीं आएँगे।”
पर वो हमेशा यही जवाब देते—
“अरे रमा, अभी मेहनत कर लूँ। बच्चों के लिए ही तो कर रहा हूँ। कल को यही दौलत उनके काम आएगी।”