इसी बीच अर्जुन की ज़िंदगी में रोशनी बनी माया। वो गाँव की सीधी-सादी लड़की थी, जो गरीब बच्चों को पढ़ाना चाहती थी। अर्जुन जब पहली बार उससे मिला तो अपनी ज़िंदगी का दर्द उसके सामने खोल दिया। माया ने कहा – “ज़िंदगी जलकर राख हो सकती है, लेकिन अगर उसी आग से दूसरों का रास्ता रोशन कर सको तो ज़िंदगी का मतलब पूरा हो जाता है।” अर्जुन को पहली बार लगा कि उसके लिए भी कोई जी सकता है। दोनों की शादी हुई और कुछ सालों में उनका एक बेटा भी हुआ। अर्जुन ने तय किया कि अपने बेटे को वो उस गरीबी और डर से दूर रखेगा, जिसमें उसने खुद बचपन बिताया।
लेकिन किस्मत को ये मंज़ूर नहीं था। राणा के आदमियों ने अर्जुन की बढ़ती ताक़त देखी और उसे खत्म करने का प्लान बनाया। उन्होंने मजदूरों को खरीदने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन का असर इतना था कि कोई खुलकर उसके खिलाफ़ नहीं गया। तब राणा ने सबसे बड़ा वार किया – उसने अर्जुन के परिवार को निशाना बनाया।
एक रात जब सब सो रहे थे, राणा के लोग घर में घुसे और गोलियाँ बरसा दीं। अर्जुन ने अपनी जान पर खेलकर माया और बेटे को बचाया, लेकिन माया बुरी तरह घायल हो गई। खून से लथपथ माया को देखकर अर्जुन का दिल चिल्ला उठा। उसने आसमान की ओर देखा और गरजकर कहा – “अब ये जंगल मेरा नहीं, तूफ़ान का होगा। जो खून मेरी बीवी का बहा है, वही आग अब तेरी रगों को जला देगी राणा।”
उस दिन के बाद अर्जुन ने मजदूरों को हथियार दिए। फावड़े, कुल्हाड़ियाँ, जो भी था, उन्होंने उसे हथियार बना लिया। जंगल में मजदूरों की सेना खड़ी हो गई। अर्जुन ने सबको कहा – “डरना मत। डर के आगे मौत है और लड़ाई के आगे आज़ादी।” गाँव के हर घर से कोई न कोई लड़ाई में उतर आया।
राणा को खबर लगी तो उसने अपने इंटरनेशनल कार्टेल वाले साथियों को बुलाया। मशीनगन, बारूद और हथियारों से लैस सेना लेकर उसने जंगल पर हमला किया। पूरा इलाका गोलियों की गड़गड़ाहट और बारूद की बदबू से भर गया। लेकिन अर्जुन और उसके मजदूर भाइयों ने जान की बाज़ी लगाकर मुकाबला किया। खून बहा, लोग गिरे, लेकिन किसी ने हार नहीं मानी।