साक्षी की शादी को दस साल हो चुके थे। उसने इस रिश्ते में हमेशा अपना सब कुछ लगाया था। घर की जिम्मेदारियाँ, बच्चों की परवरिश, सास की सेवा और पति की देखभाल—उसने कभी किसी काम से पीछे नहीं हटना चाहा। उसका मानना था कि शादी का मतलब सिर्फ़ एक रिश्ता निभाना नहीं, बल्कि एक पूरा परिवार संभालना होता है।
लेकिन उस दिन, जब वो मायके से लौटी तो घर के हालात देखकर उसका दिल बैठ गया। दरवाज़े पर कदम रखते ही उसने देखा—पति तनुज और ननद दीक्षा गुस्से से भरे खड़े थे। आसपास पड़ोसी भी जमा थे, और उनके चेहरों पर भी हैरानी झलक रही थी।
“वाह भाभी! मायके घूमने का शौक था ना? सासू माँ अकेली रह गईं, और आप मज़े से निकल गईं!” दीक्षा ने ताना मारा।
तनुज ने भी सुर में सुर मिलाया, “अरे अच्छा हुआ मैं अचानक घर आ गया। वरना मम्मी तो बेहोश पड़ी रहतीं। अगर उन्हें कुछ हो जाता, तो मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करता।”
साक्षी हक्का-बक्का रह गई। उसने घबराकर पूछा, “क्या हुआ मम्मी जी को? जब मैं गई थी, तब तो बिल्कुल ठीक थीं।”
लेकिन किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। उल्टा तनुज ने उसे कमरे से बाहर धकेलते हुए कहा, “अब चिंता जताने का नाटक मत करो। हमें तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं।”
साक्षी का दिल टूट गया। उसके अपने पति ने ही उसे दरवाज़े पर खड़ा कर दिया।
हादसा कैसे हुआ?
असलियत कुछ और थी। साक्षी मायके गई थी क्योंकि उसकी माँ की तबीयत खराब थी। वो हर बार इस वजह से रुक जाती कि सासू माँ घर पर अकेली हैं। लेकिन उस दिन खुद दामिनी जी—यानी सास—ने कहा था,
“जा बेटा, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। तू जाकर अपनी माँ को देख आ। मुझे अपनी बेटी से मिलने से रोकना ठीक नहीं।”
साक्षी बच्चों को लेकर चली गई। लेकिन उसी समय दीक्षा घर आ गई और बेल बजाने लगी। शायद गुस्से में, उसने लगातार घंटी दबाए रखी। ऊपर छत पर खड़ी दामिनी जी जल्दी-जल्दी नीचे उतरने लगीं। हड़बड़ी में उनका पैर फिसला और वो सीढ़ियों से गिर पड़ीं। सिर पर चोट लगी और पैर में फ्रैक्चर हो गया।
दरवाज़ा नहीं खुला तो पड़ोसियों की मदद से दरवाज़ा तोड़ा गया और उन्हें अस्पताल ले जाया गया। तनुज को फ़ोन किया गया और तभी से हालात बिगड़ गए।