वाह भाभी मायके घूमने का शौक था ना? सासू माँ अकेली रह गईं, और आप मज़े से निकल गईं!” दीक्षा ने ताना मारा।

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इल्जामों की बौछार

साक्षी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो सफाई कैसे दे। उसके दस साल की मेहनत, सेवा और समर्पण पर एक झटके में पानी फिर गया था।

“देखा आंटी,” तनुज ने पड़ोस की शर्मा आंटी से कहा, “बहू कभी सास की सगी नहीं होती। मायके का मोह इतना था तो शादी क्यों की?”

शर्मा आंटी ने बीच-बचाव की कोशिश की, लेकिन तनुज और दीक्षा किसी की सुनने को तैयार नहीं थे।

साक्षी चुपचाप खड़ी थी, आँसू रोकते हुए। तभी उसके दोनों बच्चे, शुभम और मान्या, ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। उन्हें देखकर साक्षी का दिल भर आया। वो उन्हें लेकर अपने कमरे की ओर बढ़ी, तो दीक्षा ने फिर आवाज़ कसी,
“कहाँ जा रही हो? भाई ने कहा ना, निकलो इस घर से!”

इस बार साक्षी रुक गई। उसने बच्चों का हाथ थामा और दृढ़ आवाज़ में बोली,
“नहीं जाऊँगी मैं। ये घर मेरा भी है। मैंने दस साल अपनी ज़िंदगी के दिए हैं यहाँ। एक गलती के लिए, जो मेरी है ही नहीं, मुझे कोई निकाल नहीं सकता। मम्मी जी को होश आने दो। फिर देखेंगे कौन सही है और कौन ग़लत।”

उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ में ताक़त थी। पड़ोसी चुपचाप वहाँ से निकलने लगे। तनुज सोफ़े पर सिर पकड़कर बैठ गया और दीक्षा तमतमाई खड़ी रह गई।

सच सामने आया

कुछ घंटों बाद दामिनी जी को होश आया। सब उनके कमरे में जमा हो गए। उन्होंने सबसे पहले साक्षी को देखा और मुस्कुराते हुए कहा,
“अरे बहू, तू आ गई।”

साक्षी की आँखें भर आईं। लेकिन दीक्षा ने मौका नहीं छोड़ा और बोली,
“मम्मी, आपकी हालत इसी की वजह से है। और आप इसे ही याद कर रही हैं?”

दामिनी जी ने गहरी साँस ली और धीमे से बोलीं,
“दीक्षा, सच ये है कि इस घर को संभालने वाली साक्षी ही है। मैंने सीढ़ियों से गिरने की वजह खुद देखी है। घंटी बजती रही और मैं जल्दी-जल्दी उतरी। इसमें बहू का कोई दोष नहीं। उल्टा, अगर वो यहाँ होती तो शायद ये हादसा ही न होता।”

तनुज चुप रह गया।

फिर दामिनी जी ने आगे कहा,
“पिछले दस सालों से इसने मेरी हर ज़रूरत पूरी की है। तुम दोनों, मेरे अपने बेटे-बेटी होकर भी मेरी आदतें तक नहीं जानते। कौन सा सामान कहाँ है, क्या खाना मैं खाती हूँ—ये सब सिर्फ़ मेरी बहू जानती है। और तुम लोग उसी को इल्जाम देते रहे?”

उनकी बातों से सन्नाटा छा गया। दीक्षा की नज़रें झुक गईं। तनुज का चेहरा शर्म से लाल हो गया।

बहू का सम्मान

साक्षी अब तक चुप थी। लेकिन दामिनी जी ने उसका हाथ पकड़कर अपने पास बिठा लिया और बोलीं,
“मेरी तसल्ली सिर्फ़ तेरे पास बैठने से होगी, बहू। तू ही मेरी ताक़त है।”

ये सुनकर साक्षी फूट-फूट कर रो पड़ी। उसकी आँखों के आँसू सिर्फ़ दर्द के नहीं, बल्कि सम्मान और अपनापन मिलने की ख़ुशी के थे।

उस दिन पूरे घर को एहसास हुआ कि रिश्ते निभाने का असली बोझ बहू ही उठाती है। और अगर वो कभी मायके चली जाए, तो उसे दोष देने से पहले सोचना चाहिए कि उसने कितने साल दिल से इस घर के लिए दिए हैं।

Ankit Verma

अंकित वर्मा एक रचनात्मक और जिज्ञासु कंटेंट क्रिएटर हैं। पिछले 3 वर्षों से वे डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं और Tophub.in पर बतौर लेखक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। लाइफस्टाइल, टेक और एंटरटेनमेंट जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते हैं।

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