रसोई से आती हलुए और ताज़ी पूरी की खुशबू पूरे घर में फैली हुई थी। घी में तली जा रही पूरीयों की छन-छन और इलायची से महकते उबलते दूध की खुशबू ने पूरे घर का माहौल बदल दिया था।
माँ बड़ी नज़ाकत से बेसन के लड्डू तल रही थी। बगल में गुलाब जामुन शरबत में डूबे-डूबे चमक रहे थे। और चूल्हे पर ताज़ा मटर पनीर की सब्ज़ी पक रही थी, जिसकी खुशबू रसोई के बाहर आँगन तक फैल गई थी।
तभी चौदह साल का बिटु दौड़कर रसोई में आया। उसकी आँखें गोल-गोल होकर फैल गईं।
“मम्मी, आज कौन सा त्योहार है? हलुआ-पूरी, लड्डू, गुलाब जामुन… और ये पनीर की सब्ज़ी! सब कुछ इतना खास क्यों?”
माँ ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन चेहरे पर छाया उदासी छुप नहीं सकी। धीमे स्वर में बोलीं—
“बेटा… आज तेरे दादाजी की पहली पुण्यतिथि है। ये सब उनकी आत्मा की शांति के लिए बनाया है। उनकी पसंद की सारी चीज़ें हैं ये—मटर पनीर, लड्डू, गुलाब जामुन। माना जाता है कि जब हम उनकी पसंद का भोजन बनाते हैं, तो उनकी आत्मा को तृप्ति मिलती है और हमें पुण्य प्राप्त होता है।”
बिटु ठिठककर वहीं खड़ा रह गया। उसके चेहरे पर मासूमियत और सवाल दोनों थे।
वो धीरे से बोला—
“पर मम्मी… जब दादाजी जिंदा थे, तब तो आपने उन्हें मटर पनीर की सब्ज़ी कभी दी ही नहीं। याद है? सुबह की बासी सब्ज़ी ही उनकी थाली में डाल देती थीं।”
माँ का चेहरा अचानक उतर गया। हाथ से चलती कलछी जैसे थम गई।
बिटु की आँखों में पुराने पल लौट आए।
“मम्मी, आपको याद है… कितनी बार दादाजी मुझे बुलाकर कहते थे—‘बिटु बेटा, रसोई में मटर पनीर की खुशबू आ रही है, थोड़ा सा ला न।’ और मैं चुपके से आपकी थाली से निकालकर ले जाता था। एक बार आपने मुझे पकड़ लिया था… और तब आपने मुझे जोर से थप्पड़ भी मारा था।”
माँ की आँखें भर आईं। उनकी हथेली अब काँप रही थी।