उसके पिता वीर प्रताप सिंह एक बड़े बिज़नेसमैन थे शहर में उनका नाम-दाम सब था, लेकिन घर में उनका साया भी मुश्किल से पड़ता था।

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लेकिन किस्मत ने सबसे बड़ा वार तब किया जब राघव ने सावित्री पर हमला करवा दिया। माँ अस्पताल में तड़प रही थीं। आखिरी वक्त में उन्होंने बेटे और पति का हाथ पकड़कर कहा—“अर्जुन, अपने पिता को माफ़ कर देना। और वीर, अब और देर मत करो… बेटे को गले लगा लो।” यह कहकर उन्होंने आखिरी साँस ली।

माँ के जाने के बाद दोनों की दुनिया बिखर गई। अर्जुन के दिल में अब सिर्फ़ बदले की आग जल रही थी। वहीं वीर प्रताप अपराधबोध में डूब गए। चिता की आग के बीच दोनों पहली बार एक-दूसरे से टूटकर मिले। वीर प्रताप की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने कहा—“बेटा, मुझसे गलती हुई। तुझे समय नहीं दे पाया, तेरा बचपन छीन लिया। लेकिन अब तुझे खोने की ताक़त नहीं है।” अर्जुन का गुस्सा थोड़ा पिघला, लेकिन उसकी आँखों में आँधी थी। उसने जवाब दिया—“मैं आपको माफ़ कर दूँगा, लेकिन पहले राघव का खून करना होगा। उसने मेरी माँ छीनी है, अब उसका नामो-निशान मिटेगा।”

बाप-बेटे दोनों साथ निकले। राघव का अड्डा रेगिस्तान के बीच था। उस दिन आसमान लाल था, हवा में धूल थी और रेत पर बारूद बिछा हुआ था। जैसे ही उन्होंने कदम रखा, गोलियों की बौछार शुरू हो गई। लेकिन इस बार अर्जुन अकेला नहीं था। उसके साथ उसका पिता खड़ा था। दोनों ने मिलकर दुश्मनों का सूपड़ा साफ़ कर दिया।

आखिरकार अर्जुन ने राघव को पकड़ लिया। उसकी आँखों में खून उतर आया था। उसने कहा—“ये तेरी आखिरी साँस है। तूने मेरी माँ छीनी, अब मैं तुझे इस धरती से मिटा दूँगा।” और उसने एक ही वार में उसका काम तमाम कर दिया।

खून से भीगी रेत पर खड़े अर्जुन और वीर प्रताप ने एक-दूसरे को देखा। वर्षों का गुस्सा और दूरी एक पल में खत्म हो गई। वीर प्रताप ने बेटे को गले लगाया और कहा—“तू मेरा खून है, मेरा वारिस। तुझसे बड़ा शेर इस धरती ने नहीं देखा।” अर्जुन की आँखों से आँसू निकले, लेकिन इस बार वो दर्द के नहीं बल्कि मोहब्बत के थे। उसने धीरे से कहा—“पापा, अगर आपने पहले ही ये आलिंगन दिया होता, तो शायद मेरी ज़िंदगी का रास्ता इतना खून-खराबा नहीं होता।”

दोनों ने सावित्री की चिता के सामने प्रण लिया कि अब यह साम्राज्य खून से नहीं, मोहब्बत से चलेगा। अर्जुन का गुस्सा शांत हो गया, और पहली बार उसने महसूस किया कि खून का रिश्ता कितना गहरा होता है।

इस कहानी का सार यही है कि चाहे कितनी भी नफ़रत हो, कितनी भी दूरी हो, बाप-बेटे का रिश्ता अंत में मोहब्बत और खून की ताक़त से ही जुड़ता है। नफ़रत मिट जाती है, पर खून का रिश्ता कभी नहीं मिटता।

Ankit Verma

अंकित वर्मा एक रचनात्मक और जिज्ञासु कंटेंट क्रिएटर हैं। पिछले 3 वर्षों से वे डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं और Tophub.in पर बतौर लेखक अपनी खास पहचान बना चुके हैं। लाइफस्टाइल, टेक और एंटरटेनमेंट जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते हैं।

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