लेकिन सच ये था कि बाहर से जितना वह कठोर दिखता था, अंदर से उतना ही टूटा हुआ बच्चा था। उसे सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए थी—अपने पिता की मोहब्बत। लेकिन वह कभी नहीं मिली।
इसी बीच कहानी में आया राघव चौहान। राघव एक बड़ा गैंगस्टर था, जिसकी नज़र वीर प्रताप के साम्राज्य पर थी। वह जानता था कि बाप-बेटे के बीच गहरी खाई है, और उसने इसी कमजोरी का फायदा उठाने की ठानी। धीरे-धीरे उसने अर्जुन के खिलाफ साज़िश रचनी शुरू कर दी।
अर्जुन की माँ सावित्री हमेशा बेटे को समझाती रहतीं—“बेटा, खून का रिश्ता कभी मिटता नहीं। चाहे जितना भी गुस्सा हो, एक दिन तू समझेगा कि तेरे पिता ही तेरी सबसे बड़ी ताक़त हैं।” लेकिन अर्जुन उनके शब्दों को अनसुना कर देता। उसके दिल में बस यही बात गूंजती रहती—“जिस बाप ने मेरे बचपन में हाथ तक नहीं पकड़ा, उसे अब मेरा दर्द कैसे समझ आएगा?”
राघव ने एक दिन अर्जुन को झूठे केस में फँसा दिया। पुलिस उसके पीछे पड़ी और साथ ही राघव के गुंडे भी। पूरा शहर मानो अर्जुन का दुश्मन हो गया था। लेकिन अर्जुन ने अकेले दम पर उनके अड्डे पर धावा बोला। गोलियों की बारिश, बारूद का धमाका, और अर्जुन की बंदूक की गूंज। वह शेर की तरह गरजा और हर किसी को धूल चटा दी।
खबर सुनकर पहली बार वीर प्रताप भी वहाँ पहुँचे। उन्होंने बेटे को उस रूप में देखा, जिसे अब तक सिर्फ़ लोग किस्सों में सुनते थे—खून से लथपथ, आँखों में आग, और चेहरे पर बगावत की लकीरें। वीर प्रताप ने कहा—“अर्जुन, तेरा गुस्सा तुझे निगल जाएगा।” लेकिन अर्जुन का दर्द उस समय फट पड़ा। वह चिल्लाया—“आपको मेरी फिक्र अब कब से होने लगी? जब मैं बच्चा था तब कहाँ थे आप? तब मैं आपकी नजरों में नहीं था, और आज जब मैं अपनी दुनिया खुद बना चुका हूँ तो आपको बेटा याद आ गया?” वीर प्रताप चुप रह गए।