अर्जुन बचपन से ही अलग स्वभाव का था। जहाँ बाकी बच्चे खेलकूद और पढ़ाई में लगे रहते, वहीं अर्जुन की आँखों में हमेशा एक अजीब-सी आग जलती रहती थी। उसका बचपन आसान नहीं था। उसके पिता वीर प्रताप सिंह एक बड़े बिज़नेसमैन थे। शहर में उनका नाम-दाम सब था, लेकिन घर में उनका साया भी मुश्किल से पड़ता था। उनका व्यापार बाहर से बहुत साफ़-सुथरा दिखता था, पर भीतर कई अंधेरे राज़ छुपे थे। दुश्मनों की लंबी लिस्ट थी, जिनसे निपटने के लिए उन्हें हमेशा बाहर रहना पड़ता। नतीजा ये हुआ कि अपने ही बेटे के साथ उनका रिश्ता कभी बन ही नहीं पाया।
अर्जुन की माँ सावित्री देवी बेटे के लिए सबकुछ थीं। वही उसका सहारा थीं, वही उसकी दुनिया। जब भी अर्जुन शिकायत करता कि “पापा मुझे प्यार नहीं करते,” तो माँ उसे समझातीं—“बेटा, तेरे पापा बुरे नहीं हैं। वो बस काम में फँस जाते हैं। अंदर से वो भी तुझसे बहुत मोहब्बत करते हैं।” लेकिन छोटे से बच्चे के दिल को ये समझ कहाँ आती। उसे तो बस इतना दिखता था कि उसके पापा हर वक्त बाहर रहते हैं, और जब घर पर आते हैं तो भी उसे गोद में लेने की फुर्सत नहीं होती।
एक बार स्कूल में अर्जुन का झगड़ा हुआ। टीचर ने उसके पापा को बुलाने के लिए फ़ोन किया, लेकिन वीर प्रताप आए ही नहीं। उस दिन अर्जुन को गहरा झटका लगा। उसे लगा कि उसके पिता को उसकी कोई परवाह ही नहीं। उसी दिन उसके दिल में यह बात बैठ गई कि “मेरे पापा मेरे लिए कुछ नहीं हैं।” धीरे-धीरे यह चोट नफ़रत में बदल गई।
समय बीतता गया और अर्जुन बड़ा होता गया। उसके भीतर की आग शांत होने की बजाय और भड़कती रही। उसकी जवानी का रंग बाकी लड़कों जैसा नहीं था। जहाँ और लोग मौज-मस्ती में लगे रहते, अर्जुन का गुस्सा और अकड़ सब पर भारी पड़ती। मोहल्ले में उसका नाम ऐसा हो गया कि गुंडे भी उसका रास्ता काटते वक्त सोचने लगे। उसके दोस्त उसे शेर कहने लगे थे।