एक रात बिजली चली गई। मीरा हाथ में मोमबत्ती लेकर हॉल से गुज़र रही थी। अर्जुन सामने से आया। मोमबत्ती काँपी, परछाइयाँ दीवार पर नाचने लगीं। उसी पल अर्जुन ने मीरा का हाथ थामा और अचानक उसे चूम लिया।
वह चुम्बन किसी अरबपति का अधिकार नहीं था। वह एक अकेले आदमी की तड़प थी। उस रात से दोनों के बीच एक ऐसा रिश्ता जुड़ा जिसे न वे नाम दे पाए, न स्वीकार कर पाए।
कुछ हफ़्तों बाद मीरा को पता चला कि वह गर्भवती है। उसने सोचा था कि अर्जुन खुश होगा, शायद ज़िम्मेदारी निभाएगा। लेकिन सच बिल्कुल उल्टा था। अर्जुन ने उसे ठुकरा दिया। पैसे की पेशकश की, लेकिन अपनापन नहीं।
मीरा ने चुपचाप हवेली छोड़ दी। उसके भीतर एक नई ज़िंदगी पल रही थी, लेकिन उसका सहारा कोई नहीं था। उसने तय किया कि वह इस बच्चे को खुद पालेगी।
पाँच साल बीत गए। समय ने उसे मज़बूत बना दिया। अब मीरा गोवा के एक छोटे से होटल में रिसेप्शनिस्ट थी। उसका साधारण सा घर, उसकी नौकरी और सबसे बढ़कर उसका बेटा – कबीर – उसकी दुनिया थे। कबीर उसकी हँसी की वजह था, उसकी थकान का इलाज था।
कबीर बिल्कुल अर्जुन जैसा था। वही मुस्कान, वही चमकती आँखें। हर बार जब वह उसे देखती, मीरा का दिल कसक उठता, लेकिन फिर वह उसे गले लगाकर सब भूल जाती।
“माँ, मेरे पापा कहाँ हैं?” एक दिन कबीर ने मासूमियत से पूछा।
मीरा ने आँसुओं को छुपाते हुए कहा –
“तुम्हारे पास मैं हूँ न? और मैं कहीं नहीं जाऊँगी।”
लेकिन किस्मत को शायद यही मंज़ूर था कि उनके रास्ते दोबारा मिलें।
एक बरसाती दोपहर होटल का मैनेजर भागता हुआ आया।
“मीरा, एक बहुत बड़े वीआईपी आने वाले हैं। सब संभाल लेना।”
मीरा मुस्कुराई – “ठीक है।” लेकिन जैसे ही उसने दरवाज़े पर खड़े आदमी को देखा, उसके कदम जम गए।
अर्जुन सिंघानिया।