सिंघानिया एस्टेट के झूमर से निकलती सुनहरी रोशनी उस रात असामान्य रूप से ठंडी लग रही थी। अर्जुन सिंघानिया, अरबपति बिज़नेस टाइकून, अपनी लाइब्रेरी में खड़े थे। सामने खड़ी थी मीरा – उनकी नौकरानी। उसकी आँखों में डर और उम्मीद दोनों थे। उसके हाथ अपने पेट पर टिके हुए थे, जैसे किसी अनमोल चीज़ की रक्षा कर रही हो।
“बाहर निकलो।” अर्जुन की आवाज़ बर्फ़ की तरह ठंडी थी।
मीरा काँप गई। उसने काँपते होंठों से कहा –
“प्लीज़ अर्जुन… यह तुम्हारा बच्चा है।”
एक पल के लिए अर्जुन की आँखें झिलमिलाईं, जैसे भीतर कुछ टूटा हो। मगर अगले ही पल उन्होंने नज़र फेर ली।
“मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मेरे साथ कोई धोखा नहीं करेगा। तुम्हें मुआवज़ा मिल जाएगा, लेकिन यहाँ दोबारा कदम मत रखना।”
मीरा के दिल पर जैसे किसी ने चाकू चला दिया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह मुड़ी और भारी क़दमों से वहाँ से चली गई। दरवाज़ा उसके पीछे ऐसे बंद हुआ जैसे किसी ने उसकी ज़िंदगी की आख़िरी उम्मीद भी छीन ली हो।
वह सब कुछ महीनों पहले शुरू हुआ था। हवेली की लाइब्रेरी, रात का सन्नाटा, बाहर तेज़ तूफ़ान और भीतर सिर्फ़ काग़ज़ों की सरसराहट। मीरा देर तक वहीं काम करती थी। अर्जुन भी अक्सर वहीं रुक जाते थे। शुरू में बातचीत बस काम की होती थी, फिर धीरे-धीरे बातों का सिलसिला लंबा होने लगा।
वह उसे अपने बिज़नेस के किस्से सुनाता, वह अपनी बीमार माँ और अपने छोटे शहर की नदी की बातें करती। दोनों कभी हँसते नहीं थे, लेकिन उनकी आँखों में अनकहा सुकून था।