रेगिस्तान के बीच एक जगह थी “धूलगढ़”। यहाँ सिर्फ दो चीज़ें मिलती थीं – मौत और सोना। रेत के नीचे छिपी खदानों से सोना निकलता था, लेकिन उन खदानों पर राज करता था खूँखार डकैत काला भैरव। उसकी आँखों में खून और दिल में सिर्फ लालच था। जिसने भी सोने की खदान में पैर रखा, या तो उसका ग़ुलाम बन गया या उसकी लाश रेत में गड़ गई।
लेकिन कहानी शुरू होती है एक अनाथ लड़के से – आदित्य। बचपन में ही उसके पिता को भैरव ने मार डाला और माँ ने भूख-प्यास में दम तोड़ दिया। आदित्य ने तभी कसम खाई थी – “रेत के नीचे दबा हर कतरा सोना मेरा होगा… और ये धरती एक दिन मेरा नाम पुकारेगी।”
पहला टकराव
आदित्य बड़ा हुआ तो उसकी आँखों में आग और बाजुओं में तूफ़ान था। उसने अकेले दम पर भैरव के आदमी मार गिराए और गाँववालों को पहली बार डर से आज़ादी का अहसास हुआ। उसकी तलवार का पहला वार गूंजा – “अब इस रेत पर राज तुम्हारा नहीं… आदित्य का होगा।”
भैरव हँसा और बोला – “रेत पर पानी टिकता नहीं, और तेरी औकात भी।” लेकिन उसे अंदाज़ा नहीं था कि सामने खड़ा लड़का रेत का तूफ़ान बनने वाला है।
उभरता सम्राट
दिन गुज़रे, खून बहा, और आदित्य ने धीरे-धीरे हर खदान पर क़ब्ज़ा करना शुरू किया। उसकी शान थी – सोने से ढली तलवार और काली पगड़ी। लोग उसे “रेत का सम्राट” कहने लगे। उसकी सबसे बड़ी ताक़त सिर्फ तलवार नहीं थी, बल्कि उसका इरादा – “मैं अपने लिए नहीं, उन मज़लूमों के लिए लड़ता हूँ जो इस रेत में रोज़ दफ़्न हो रहे हैं।”