जब आदित्य चरम पर था, तभी उसके सबसे करीबी साथी ने धोखा दिया। सोने के लालच में उसने भैरव से हाथ मिला लिया। एक रात खदान में हमला हुआ, बारूद फटा, और आधा इलाका जलकर राख हो गया। आदित्य घायल पड़ा रहा लेकिन मरने से पहले उसकी आँखों में आग और भी तेज़ हो चुकी थी।
उसने दहाड़कर कहा – “मेरी राख से जो उठेगा, वो तूफ़ान होगा… और उस तूफ़ान का नाम फिर गूंजेगा – आदित्य!”
क्लाइमेक्स
आख़िरी लड़ाई रेगिस्तान के बीच हुई। रेत का तूफ़ान उठा हुआ था, आसमान लाल था। एक तरफ़ काला भैरव अपनी हजारों फौज के साथ, और दूसरी तरफ़ अकेला आदित्य। लेकिन आदित्य ने हर वार ऐसा किया कि रेत खून से भीग गई।
भैरव ने सोचा वो जीत जाएगा, पर आदित्य ने उसकी गर्दन पकड़कर वही डायलॉग दोहराया – “रेत का सम्राट वही होगा… जिसे लोग डरकर नहीं, भरोसा करके याद करें।” और एक ही वार में उसने भैरव का सिर धड़ से अलग कर दिया।
अंत
धूलगढ़ की रेत अब गुलामी की नहीं, आज़ादी की गवाही दे रही थी। आदित्य सोने के सिंहासन पर बैठा, लेकिन उसकी आँखों में कोई लालच नहीं था। वो बोला – “सोना रेत में गड़ा था, अब इंसानियत के काम आएगा।”
गाँववाले उसे भगवान मानने लगे। पर आदित्य सिर्फ मुस्कुराकर कहता – “भगवान नहीं हूँ… बस रेत का बेटा हूँ।”
अंकित वर्मा एक रचनात्मक और जिज्ञासु कंटेंट क्रिएटर हैं। पिछले 3 वर्षों से वे डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं और Tophub.in पर बतौर लेखक अपनी खास पहचान बना चुके हैं।
लाइफस्टाइल, टेक और एंटरटेनमेंट जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते हैं।