कुछ दिन बाद…
घर का माहौल बदल गया था।
कमला अब भी ताने कसती थीं।
अनिल अक्सर मज़ाक उड़ाता था।
लेकिन राजेश का चेहरा बदल चुका था।
वह देर रात घर आता, चुप रहता, लेकिन अपनी बेटी को गोद में लेकर चुपचाप उसके आँसू पोंछता।
उसकी आँखों में एक दृढ़ निश्चय दिखता – “अब कुछ बदलना ही होगा।”
एक रात, जब मैं अपनी बेटी को दूध पिला रही थी, राजेश मेरे पास आकर बैठा।
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा:
“मैंने फैसला कर लिया है। हम इस घर से निकल रहे हैं।”
मैं हैरान रह गई।
“क्या? तुम सच कह रहे हो?”
राजेश की आँखें पथराई हुई थीं, लेकिन आवाज़ सख्त थी:
“हाँ। कल मैंने दफ़्तर के पास एक छोटा सा घर देखा है। बड़ा तो नहीं है, लेकिन वहाँ हमारी बेटी का दूध कोई नहीं छीन पाएगा।”
अगली सुबह, नाश्ते की मेज़ पर राजेश ने सबके सामने घर की चाबी रख दी।
उसकी आवाज़ गूँजी:
“आज से, हम यहाँ से चले जाएँगे। यह विश्वासघात नहीं है, यह एक पति और एक पिता की ज़िम्मेदारी है।”
पूरा परिवार स्तब्ध रह गया।
अनिल कुछ बोलने ही वाला था, लेकिन शब्द गले में अटक गए।
कमला खड़ी हो गईं, उनकी आँखें लाल थीं:
“राजेश! तू अपनी माँ को छोड़ देगा? सिर्फ़ एक बेटी के लिए?”
राजेश ने मेरा हाथ थामा और दृढ़ स्वर में बोला:
“नहीं माँ। बेटी के लिए नहीं… अपने असली परिवार के लिए। तुम उसे पराया मानती हो, लेकिन मेरे लिए वही मेरी दुनिया है।”
उस पल मेरी आँखों से आँसू झरने लगे।
मेरी गोद में सोई छोटी बच्ची शांति से साँस ले रही थी, मानो उसे भी अब सुरक्षा मिल गई हो।
बाहर आसमान में बादल छाए थे, आँधी आने का संकेत था।
लेकिन मेरे दिल में एक नई रोशनी जल चुकी थी।
अब चाहे कितने भी तूफ़ान क्यों न आएँ –
मेरे पति ने सही फैसला लिया था।
उन्होंने अपनी बेटी को चुना, अपने परिवार को चुना… और हमें एक नई ज़िंदगी दी।