तभी दरवाज़े से मेरे पति राजेश अंदर आए। उनके पीछे मेरे देवर अनिल भी थे।
कमला ने तुरंत अपनी बात बदल ली, और आह भरते हुए बोलीं:
“देखो, तुम्हारी पत्नी कितनी स्वार्थी है। पोते को दूध पिलाने से रोक रही है।”
कमरा अचानक सन्नाटे में डूब गया।
बस मेरी बच्ची की सिसकियाँ थीं, जो हर किसी के दिल में चुभ रही थीं।
मैंने साहस जुटाया और काँपती आवाज़ में कहा:
“माँ, मेरी बेटी भी आपकी पोती है। आप क्यों उसका हक़ छीनती हैं? वो भी भूखी है… कमज़ोर है…”
राजेश की आँखें माँ पर टिक गईं। उनकी भौंहें सिकुड़ गईं:
“माँ… ये सच है?”
कमला बड़बड़ाईं:
“थोड़ा दूध ही तो है। बड़ा पोता है, उसे ज़्यादा दे दिया तो क्या ग़लत है?”
अनिल ने तुरंत बीच में हँसते हुए कहा:
“हाँ भाभी, आप तो बात का बतंगड़ बना रही हैं। बहन को थोड़ा कम मिल गया तो क्या? दूध बाँट लेने से किसका क्या बिगड़ जाएगा?”
मेरी आँखों में आँसू भर आए।
मैंने उम्मीद से राजेश की ओर देखा।
दिल चाहता था – वह मेरा साथ दे, मेरी बेटी का साथ दे।
और तभी, राजेश ने गहरी साँस ली।
उसकी आवाज़ गूँज उठी:
“बस, माँ! अब और नहीं। मेरी बेटी भी उतनी ही हक़दार है जितना कोई और बच्चा। उसका हिस्सा कोई नहीं छीन सकता।”
पूरा घर सन्न रह गया।
कमला की आँखें गुस्से से लाल हो गईं।
वह चीखी:
“राजेश! तू अपनी माँ के खिलाफ खड़ा हो रहा है? सिर्फ़ एक बेटी के लिए?”
राजेश ने मेरी बच्ची को अपनी गोद में लिया, उसका दुबला-पतला चेहरा देखा और दृढ़ आवाज़ में कहा:
“बेटी के लिए नहीं, माँ। अपने परिवार के लिए। अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं ये घर छोड़ दूँगा। लेकिन अपनी बेटी को भूखा मरते नहीं देखूँगा।”
मेरी आँखों से आँसू बह निकले।
मैंने अपनी बच्ची को कसकर सीने से चिपका लिया।
उस पल मुझे समझ आया – चाहे रिश्ते टूट जाएँ, चाहे घर बिखर जाए, लेकिन अब मेरी बेटी का हक़ कोई नहीं छीन पाएगा।